tag:blogger.com,1999:blog-21658146.post-1142615439892976662006-03-17T22:38:00.001+05:302006-03-17T22:40:39.896+05:30चिर-प्रतीक्षितकब से सुन रहा हूँ सुदूर से आती हुई
तुम्हारे पदचापों की मधुर ध्वनि
आ रहे हो तुम
धीरे-धीरे हमारे बीच
तुम्हारे आने की ख़बर
हमें सदियों से है
हम हर घड़ी तुम्हारे ही इंतजार में रहे हैं।
पहुँच चुके हैं धरा पर
तुम्हारे पगों के स्पंदन
आ तो चुके हो मगर छुपे हो
आम लोगों की ओट में
न हो तुम कोई राजकुमार
और न ही किसी पंडित की संतान
न तो तुम किसी नेता के बेटे हो
और न ही किसी अफसर के पुत्र
इतने सीधे-साधे हो Srijan Shilpinoreply@blogger.com