Monday, February 20, 2006

भारत में पसारे बर्ड फ़्लू ने पैर

महाराष्ट्र के नंदुरबार और धुले ज़िलों में स्थित मुर्ग़ीपालन फार्मों में पिछले दस दिनों से बड़ी संख्या में मुर्गियों के मरने का सिलसिला चल रहा था। मुर्गीपालन से जुड़े स्थानीय लोग इसे ‘रानीखेत’ नामक एक मौसमी बीमारी मानकर चल रहे थे, लेकिन जब तक प्रशासन को संकट की गंभीरता का पता चल पाता, देर हो चुकी थी और लाखों मुर्गियाँ इसकी चपेट में आ चुकी थीं। 18 फरवरी को भोपाल स्थित पशु रोग प्रयोगशाला में इन मुर्गियों के एवियन इंफ़्लुएंज़ा-ए (एच5एन1) नामक बर्ड फ़्लू विषाणु से ग्रसित होने की पुष्टि की खबर आने के बाद केन्द्र सरकार और संबंधित राज्य सरकारों के स्वास्थ्य प्रशासन तथा आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारी हरकत में आए और भारत में बर्ड फ़्लू महामारी की रोकथाम के लिए जरूरी उपाय युद्ध स्तर पर शुरू कर दिए गए। इन उपायों के अंतर्गत पशु चिकित्सकों की निगरानी में प्रभावित इलाकों में नौ लाख से अधिक मुर्गियों को तुरंत मार दिया जाना, लोगों को बर्ड फ़्लू के संक्रमण से बचाने के लिए आसपास के तीन किलोमीटर के दायरे की घेराबंदी किया जाना और दस किलोमीटर के दायरे में सभी मुर्ग़े-मुर्गियों को दवाई पिलाया जाना, मुर्गीपालन से जुड़े लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए टीका लगाया जाना और मुर्गी उत्पादों के व्यापार पर निगरानी रखा जाना, आदि शामिल हैं। भारत में बर्ड फ़्लू विषाणु की मौजूदगी की पहली बार हुई इस पुष्टि के बाद हमारा देश भी बर्ड फ़्लू से अब तक प्रभावित हो चुके लगभग 30 देशों की सूची में जुड़ गया है। हालाँकि जनवरी के अंतिम सप्ताह में भी असम के धुबरी जिले के लगभग बीस गाँवों में हजारों की तादाद में अप्रत्याशित रूप से मुर्गियों के मरने की खबरें आई थी, लेकिन उस वक्त बर्ड फ्लू विषाणु के परीक्षण के संबंध में शायद समुचित तत्परता नहीं बरती गई। जबकि चीन और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में बर्ड फ्लू के फैलने के बाद उनसे सटे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में बर्ड फ़्लू फैलने की आशंका प्रबल हो गई थी और जनवरी, 2004 में पाकिस्तान में बर्ड फ्लू फैलने की खबर आने के बाद 30 जनवरी, 2004 को भारत सरकार ने विशेषकर पाकिस्तान से सटे राज्यों पंजाब, राजस्थान और गुजरात में रेड एलर्ट भी घोषित कर दिया था।
हालाँकि भारत में किसी व्यक्ति के बर्ड फ़्लू विषाणु से संक्रमित होने की पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है, लेकिन महाराष्ट्र और गुजरात राज्य में मुर्गीपालन से जुड़े कुछ लोगों में बर्ड फ़्लू से मिलते-जुलते लक्षणों की शिकायत मिलने से इस बात की आशंका बढ़ गई है कि भारत में भी इस विषाणु का संक्रमण कहीं पक्षियों से मनुष्यों में न फैल जाए, जो कि एक अत्यंत खतरनाक स्थिति होगी। जनवरी, 2004 के बाद कंबोडिया, चीन, इंडोनेशिया, थाइलैंड, वियतनाम, तुर्की और ईराक सहित कई देशों में मनुष्यों में बर्ड फ्लू विषाणु के संक्रमण की पुष्टि हो चुकी है और दुनिया भर में अभी तक 80 से अधिक व्यक्ति बर्ड फ्लू की चपेट में आने के बाद मौत का शिकार हो चुके हैं। पहले यह समझा जाता था कि बर्ड फ़्लू केवल पक्षियों में ही होता है, लेकिन पहली बार 1997 में हांगकांग में एक व्यक्ति के बर्ड फ़्लू से संक्रमित होने की पुष्टि के बाद इस रोग को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विशेष गंभीरता से लिया जाने लगा।
हालाँकि अभी तक बर्ड फ्लू विषाणु का संक्रमण एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य में होने की कोई जानकारी नहीं है, लेकिन वैज्ञानिकों को आशंका है कि बर्ड फ़्लू के विषाणु का मानव फ़्लू के विषाणु से उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) हो जाने पर एक नए प्रकार का विषाणु उत्पन्न हो सकता है जिससे यह मानव से मानव में संक्रमण के जरिए फैलने वाली महामारी का स्वरूप ले सकता है। इस बीमारी के महामारी का रूप लेने पर बड़े पैमाने पर लोगों के स्वास्थ्य की हानि होने के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर संकट आ जाएगा। विश्व बैंक का आकलन है कि अगर बर्ड फ़्लू महामारी के रूप में फैला, तो हर साल विश्व अर्थव्यवस्था को 800 अरब डॉलर का नुक़सान हो सकता है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बर्ड फ़्लू की चपेट में आए देशों को चेतावनी दी है कि वे इस बीमारी से जुड़ी ख़बरों को ज़ाहिर करने में ईमानदारी बरतें और संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी उन देशों को आगाह किया गया है जो अपने यहाँ बर्ड फ़्लू की मौजूदगी को छिपा रहे हैं। पिछले महीने 17-18 जनवरी को बीजिंग में संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व बैंक द्वारा संयुक्त रूप से बर्ड फ़्लू से निपटने के लिए एक कोष जुटाने के उद्देश्य से दाता देशों का एक सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें आशा से भी अधिक 1.90 अरब डॉलर राशि जुटाई गई, जिसका इस्तेमाल विशेषकर विकासशील देशों में स्वास्थ्य और चिकित्सा सेवाओं पर ख़र्च करने में किया जाएगा, ताकि बर्ड फ़्लू के ख़तरनाक एच5एन1 वायरस मनुष्यों में न फैल सकें। दुनिया के विकसित देश खासकर यूरोपीय संघ के देश इस मामले में पहले ही सचेष्ट हो चुके हैं और जरूरी एहतियाती उपाय कर चुके हैं, जिसके तहत बर्ड फ्लू से प्रभावित देशों से पक्षियों (पोल्ट्री) के आयात पर पाबंदी लगा दी गई है।
बर्ड फ्लू को फैलने से रोकने के लिए अभी तक सबसे कारगर उपाय यही माना जाता है कि संक्रमण की आशंका वाले इलाके के पक्षियों को मार कर दफ़ना दिया जाए या जला दिया जाए, लेकिन पक्षियों को मारने के दौरान इस अभियान में शामिल लोगों और संक्रमित पक्षियों के संपर्क में रह रहे लोगों के भी संक्रमित होने की आशंका बनी रहती है, जिससे बचने के लिए विशेष सावधानी और जरूरी उपाय किए जाने जरूरी हैं। अभी तक बर्ड फ्लू विषाणु से बचने के लिए किसी प्रतिरोधी टीके की खोज नहीं हो पाई है, हालाँकि टैमीफ्लू नामक दवा इससे संक्रमित हो चुके व्यक्तियों के उपचार में काफी हद तक कारगर मानी जाती है। बर्ड फ्लू के संक्रमण से बचने के लिए पक्षियों के प्रवास पर निगरानी रखने और खासकर जंगली पक्षियों और घरेलू पक्षियों के बीच संपर्क पर भी विशेष निगरानी रखे जाने की आवश्यकता है। भारत के तमाम पड़ोसी देशों में बर्ड फ्लू पहले ही गंभीर रूप ले चुका है, इसलिए यह वक्त की नजाकत है कि भारत बर्ड फ्लू की समस्या से निपटने में कोई चूक न करे और इस रोग को अपने पैर देश के अंदर पसारने नहीं दे।
Rashtriya Sahara has published this article on its Editorial Page on 21 Feb, 2006.

2 comments:

आशीष said...

भैया, हमारी तो ये समझ मे नही आ रहा सारे सीमांत प्रातों को छोडकर ये बर्ड फ्लू नांदूरबार जैसे जगह कैसे पहुंच गया ?
ये ना तो सीमा के आसपास है ना भरतपूर जहां दूर देश से पक्षी आते हो ! ना ही यहां दूसरे देशो से पक्षीयो का व्यापार होता है !
जरा ये भी देखें

Srijan Shilpi said...

हो सकता है कि इसमें कुछ साजिश हो। सचाई का पता लगाने के लिए सरकार जाँच करवा रही है। लेकिन फिलहाल जरूरी सावधानी बरती जानी चाहिए। इंसान मुर्गे को मारकर खाता है अपने स्वास्थ्य और स्वाद के लिए। लेकिन जब अपनी जान पर ही खतरा मँडराने लगे तो वह मुर्गे को मारकर अपना बचाव करने का प्रयास कर रहा है। दोनों ही सूरत में मुर्गे को तो मरना ही है। सवाल है पोल्ट्री उद्योग को हो रहे नुकसान का और बर्ड फ्लू के हौवे का भयादोहन करने की कोशिश कर रहे लोगों की साजिश का। नुकसान की भरपाई करने और साजिश का पता लगाने के लिए सरकार कदम उठा रही है। हमें इंतजार करना चाहिए।