Saturday, April 22, 2006

आरक्षण बनाम योग्यता

यह सही है कि आरक्षण का मुद्दा भारत में राजनीतिज्ञों के लिए वोटबैंक को बढ़ाने और बरकरार रखने का हथियार बन चुका है। यह भी सही है कि आरक्षण के प्रावधान से विकास की रफ्तार बाधित होती है। यह भी सही है कि आरक्षण के कारण कुछ योग्य लोग बेहतर अवसरों के लाभ से वंचित रह जाते हैं और उनके स्थान पर अपेक्षाकृत कम योग्य लोगों को वह अवसर मिल जाता है। यह भी सही है कि आरक्षण एक अस्थायी उपाय है जिसे लंबे समय तक लागू नहीं रखा जाना चाहिए। यह भी सही है कि आरक्षण के प्रावधान से जाति-आधारित कटुता बढ़ रही है जिससे सामाजिक समरसता स्थापित करने में अधिक दिक्कत आएगी। कोई भी विवेकशील व्यक्ति उपर्युक्त तथ्यों से असहमत नहीं हो सकता। लेकिन इससे पहले कि आरक्षण के विरोध में आप कोई मोर्चाबंदी करने के लिए निकलें, आपके पास इसका कोई बेहतर और ठोस विकल्प अवश्य होना चाहिए। जिन लोगों को ‘आरक्षण’ दिया जाना आप पसंद नहीं करते, उन्हें संविधान के अनुसार प्रतिष्ठा और अवसर की समानता तथा सामाजिक न्याय प्रदान करने के लिए आपके पास कौन-सा बेहतर वैकल्पिक उपाय है? भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो इसके लिए आरक्षण का ही उपाय किया गया है।

मीडिया का दुरुपयोग करने से बचें यदि आप भारतीय संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखते हैं तो आपको आरक्षण के उस प्रावधान को लागू किए जाने का समर्थन करना चाहिए जिसे भारत की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार भारतीय संविधान के उपबंधों के दायरे में लागू करना चाह रही हो। यदि आपकी आस्था संविधान और लोकतंत्र में नहीं है तो फिर यह ध्यान रखिए कि आप आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान का विरोध भी इसीलिए कर पा रहे हैं क्योंकि भारतीय संविधान और लोकतंत्र ने ही आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार दिया है। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस्तेमाल के मुख्य माध्यम प्रेस और मीडिया पर अपने वर्चस्व की बदौलत यदि आप सरकार को संविधान के विपरीत दिशा में चलाने की कोशिश करना चाह रहे हों तो यह कोशिश आपको बहुत मंहगी पड़ सकती है, क्योंकि प्रेस और मीडिया का सारा कारोबार जिन पाठकों और दर्शकों के भरोसे पर टिका हुआ है उनका बहुमत संवैधानिक प्रावधानों का इस तरह मजाक बनाए जाते देखना पसंद नहीं करेगा और उनसे विमुख हो जाएगा। मीडिया के लोगों को इसकी बानगी उस दिन देखने को मिली जब एन.डी.टी.वी. द्वारा आरक्षण के मुद्दे पर आयोजित परिचर्चा में शामिल होने आए दर्शकों में से पिछड़े वर्ग के बहुत-से युवाओं ने कार्यक्रम के एकपक्षीय संचालन के विरोध में कार्यक्रम का बीच में ही बहिष्कार कर दिया और स्टूडियो से बाहर चले गए। बरखा दत्त ने इस घटना का जिक्र हिन्दुस्तान टाइम्स में संपादकीय पृष्ठ पर छपे अपने आलेख में भी किया। जो मीडिया जनमत का प्रतिनिधित्व नहीं करे और जब थोड़े से सवर्ण पत्रकार स्वयं को भारत का भाग्य विधाता समझकर अपने जातिगत स्वार्थ की पूर्ति और मिथ्या अभिमान की संतुष्टि के लिए संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक व्यवस्था का मजाक बनाने की कोशिश करें तो न केवल वे अपनी विश्वसनीयता गँवा देंगे, बल्कि जनता का बहिष्कार भी झेलने के लिए बाध्य हो जाएंगे। यदि आप वाकई आरक्षण के प्रावधान को लागू होने नहीं देना चाहते हैं तो मीडिया का गलत इस्तेमाल करने के बजाय आपको लोकतांत्रिक चुनाव के जरिए संसद में बहुमत हासिल करना चाहिए और संविधान में संशोधन करके आरक्षण के प्रावधान को हटा देना चाहिए।

क्या हो सकता है आरक्षण का विकल्प आरक्षण का एक कारगर विकल्प हमारे राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने सुझाया कि प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों और केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में जितनी सीटें आरक्षित की जा रही हों, कुल सीटों की संख्या उसी अनुपात में बढ़ा दी जानी चाहिए ताकि गैर-आरक्षित श्रेणी के लिए पहले की तरह अवसर उपलब्ध रहें। इस सुझाव का व्यापक स्वागत हुआ। सीटों की संख्या जितनी बढ़ाई जा सके उतनी बेहतर है ताकि अधिक से अधिक लोगों को उच्च शिक्षा हासिल करने का मौका मिल सके। आदर्श स्थिति तो वह होगी जिसमें हर शिक्षार्थी को पढ़ने को मौका मिले और हर बेरोजगार को रोजगार मिले। लेकिन चूंकि प्रत्याशी अधिक होते हैं और अवसरों की उपलब्धता काफी कम होती है, इसलिए प्रतियोगिता आयोजित कराई जाती है ताकि जो सबसे योग्य हों उन्हें ही सीमित अवसरों का लाभ मिल सके। लेकिन असमान सामाजिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि के प्रत्याशियों के बीच स्वस्थ प्रतियोगिता कदापि नहीं हो सकती। भारत में अभी तक ऐसी व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई है जिसमें किसी प्रतियोगिता के आयोजन से पहले हर प्रत्याशी को उसकी तैयारी के लिए समान सुविधा और समान परिस्थिति उपलब्ध हो सके। आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था में कृष्ण और सुदामा अब एक साथ नहीं पढ़ा करते और कोई कृष्ण अब किसी सुदामा का मित्र नहीं होता। यदि आप आरक्षण के प्रावधान को समाप्त करना चाहते हैं तो पहले आप ऐसी व्यवस्था विकसित कीजिए ताकि किसी प्रतियोगिता में भाग लेने वाले हर प्रतियोगी को समान सामाजिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि उपलब्ध हो सके।

क्या हैं योग्यता के मायने जब आप योग्यता की बात करते हैं और प्रतियोगिता के आयोजन के द्वारा उसका निर्धारण किए जाने की वकालत करते हैं तो पहली बात यह कि प्रतियोगिता का संचालन और योग्यता का निर्धारण करना भी आपके ही हाथों में रहा है, और आपने इसमें आज तक ईमानदारी नहीं दिखाई है। विशेषकर साक्षात्कारों के आधार पर योग्य प्रत्याशी का चयन किए जाने में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की कोई व्यवस्था नहीं होती। सचाई तो यह है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के बहुत से प्रत्याशियों को संवैधानिक उपबंधों के बावजूद आरक्षण के लाभ से लंबे समय तक वंचित ही रखा गया, क्योंकि जिन पदाधिकारियों के अधिकार-क्षेत्र में उन उपबंधों को लागू करने का दायित्व था, वे चाहते नहीं थे कि आरक्षित पदों पर अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोग भर्ती किए जाएँ। इसलिए वे फाइलों पर यह दर्ज करते रहे कि आरक्षित वर्गों के ‘उपयुक्त’ उम्मीदवार उपलब्ध नहीं होने के कारण उनके स्थान पर सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों की भर्ती कर ली गई। ऐसी नियुक्तियों के मामले में जो भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार चलता रहा, उसे उस दौर में सरकारी सेवा में रह चुका हर व्यक्ति जानता है। इस बारे में काफी विरोध होने पर बाद में ऐसे स्पष्ट प्रावधान किए गए ताकि आरक्षित रिक्त पदों को सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों से नहीं भरा जा सके। प्रतियोगिता के जरिए योग्यता के निर्धारण की प्रक्रिया का मुख्य आधार ‘पदानुक्रम’ (Hierarchy) और ‘सर्वोत्तम की उत्तरजीविता’ (Survival of the fittest) का सिद्धांत है। लेकिन आपने प्रतियोगिता के बजाय वर्ण-व्यवस्था के आधार पर पिछले हजारों वर्षों से योग्यता और श्रेष्ठता को अपना जन्मजात अधिकार समझकर समाज के बहुसंख्यक वर्गों को अपने अधीन बनाए रखा। प्रतियोगिता पर आधारित ‘सर्वोत्तम की उत्तरजीविता’ (Survival of the fittest) के सिद्धांत पर अमल करते हुए पहले तुर्कों-मुगलों ने और बाद में अंग्रेजों ने आपके जन्मजात अधिकार को चुनौती दी और आपकी योग्यता और श्रेष्ठता तब धूल चाटने लगी। तब आपमें से अधिकांश अवसरवादी लोग मुगलों और अंग्रेजों की चाटुकारिता में लग गए और जब आजादी मिलने का समय आया तो चूहे की तरह कूदकर सत्ता और सरकार में शामिल हो गए। भारत का स्वतंत्रता संघर्ष तो मुख्य रूप से पिछड़े और दलित वर्ग के लोगों ने लड़ा, लेकिन उसके नेतृत्व पर सवर्ण वर्ग के नेताओं ने अपना वर्चस्व कायम कर लिया।

र्वोदय और आरक्षण आजादी मिलने के बाद पहली बार भारतीय संविधान में ‘सर्वोत्तम की उत्तरजीविता’ के स्थान पर सर्वोदय के सिद्धांत को कार्यान्वित किया गया, हालाँकि बात हमारे यहाँ सदियों से ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ की होती रही है। भारतीय लोकतंत्र का आदर्श स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व पर आधारित सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना है। लोकतांत्रिक भारत में इस आधार पर किसी को प्रतिष्ठा और अवसर की समानता से वंचित नहीं किया जा सकता कि वह आपसे कम योग्य है। यदि कोई फिलहाल आपसे कम योग्य है तो उसकी संभावना का विकास कीजिए और उसे अपने बराबर की प्रतिष्ठा और अवसर दीजिए ताकि वह आपसे स्वस्थ प्रतियोगिता कर सकने में सक्षम बन सके। “प्रत्येक जीव अव्यक्त ब्रह्म है।” हर मानव में विकास करने की असीम संभावना छिपी होती है, उस संभावना का पता लगाइए और उसका विकास करने का अवसर और माहौल दीजिए। भारतीय संविधान में दलित और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान इसीलिए किया गया है। जब पिछड़े वर्गों को सरकारी सेवाओं में आरक्षण दिया जाने लगा तो आपने कहा कि नौकरी में आरक्षण मत दो, उन्हें पढ़ाई-लिखाई की सुविधा दो ताकि पहले वे योग्य हो जाएँ, उसके बाद रोजगार प्राप्त करें। अब जब पढ़ाई-लिखाई के मामले में आरक्षण दिए जाने की बात उठी तो आप कहते हैं कि यह गलत हो रहा है, योग्यता का गला घोंटा जा रहा है और शिक्षा का स्तर बिगाड़ा जा रहा है। अब आप उच्च शिक्षा में आरक्षण का विरोध कर रहे हैं। संविधान लागू होने के बाद 40 वर्ष तक आपलोगों ने ऐसा कुछ क्यों नहीं किया ताकि पिछड़े वर्गों को आरक्षण की जरूरत नहीं पड़ती। जब संविधान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के साथ-साथ सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े अन्य वर्गों को भी आगे लाने के लिए विशेष उपाय किए जाने की बात कही गई तो उनपर अमल क्यों नहीं किया गया। सच बात यह थी कि आपकी नीयत नहीं थी उन्हें बराबरी का हक़ देने की। जब उनमें राजनीतिक और सामाजिक चेतना का विकास हुआ तो वे लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीकों से अपना हक़ हासिल करने की चेष्टा में लगे हैं।

सामाजिक न्याय और राजनीतिक मजबूरी यह ठीक है कि 1990 में मंडल आयोग की कुछ सिफारिशों को लागू करके कुछ राजनेताओं ने अपनी राजनीति खूब चमकाई। उसी के बाद सामाजिक न्याय का मुद्दा हर राजनीतिक दल की ज़बान पर चढ़ा। पिछड़े वर्गों का पहली बार ऐसा ध्रुवीकरण हुआ कि वह दलित वर्ग से भी बड़ा वोट बैंक बनकर उभरा जिसको अपने पाले में करना सत्ता हासिल करने की ख्वाहिश रखने वाले हर राजनीतिक दल की मजबूरी हो गई। हालाँकि दोनों बड़े राजनीतिक दल -- कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी सामाजिक न्याय की राजनीति को आत्मसात नहीं कर पाए। लेकिन पिछड़े डेढ़ दशक में इन दोनों राजनीतिक दलों को भलीभाँति अनुभव हो गया कि सामाजिक न्याय के मुद्दे को छोड़कर भारतीय राजनीति में सत्ता हासिल कर पाना संभव नहीं है। भारतीय जनता पार्टी ने मंडल की काट के लिए कमंडल के अस्त्र को आजमाया, लेकिन वह अधिक दिनों तक कारगर साबित नहीं हो पाया। कांग्रेस पार्टी ने आर्थिक ‘सुधारों’ और निजीकरण के द्वारा भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा के जरिए विकास के सिद्धांत को स्थापित करने की रणनीति अपनाई। लेकिन उसे मालूम है कि इससे चुनाव जीते नहीं जा सकते, इसलिए उसे भी मजबूर होकर शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण और निजी क्षेत्रों में आरक्षण के मुद्दे को अपनाना पड़ा। वामपंथी पार्टियाँ आर्थिक न्याय की राजनीति पर जोर दिए जाने की वकालत करती रही, लेकिन सत्ता से जुड़े रहने के बावजूद ठोस धरातल पर वे इस दिशा में कुछ भी कारगर प्रयास नहीं कर सकीं। जो चरमपंथी वामपंथी पार्टियाँ थी उनलोगों ने नक्सलवाद के रूप में आर्थिक न्याय को हासिल करने के लिए एक ऐसी राह पकड़ ली, जो लोकतंत्र और संविधान के ही विपरीत दिशा में काम करता है।

स्थायी समाधान आरक्षण का स्थायी विकल्प यही हो सकता है कि आप सबके लिए पर्याप्त अवसर पैदा कर दें ताकि किसी को आरक्षण देने की नौबत ही नहीं आए। दूसरा समाधान यह कि व्यक्ति अपनी योग्यता और अभिरुचि के अनुसार चाहे जो भी वैध रोजगार करे और उसकी आमदनी चाहे जितनी कम हो, उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा और जीवन के लिए उपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित की जाए। प्रकृति ने मनुष्यों में प्रतिभा, क्षमता और अभिरुचि की विविधता प्रदान की है, लेकिन मनुष्यों ने उस विविधता को पदानुक्रम का पैमाना बना लिया है। जब तक पदानुक्रम की मानसिकता समाप्त नहीं होती, तब तक आरक्षण का प्रावधान भी जारी रहेगा।

12 comments:

तेज प्रताप said...

किसी ने खूब कहा है, "स्वतन्त्रता दी नही जाती, ली जाती है " | अंग्रेज चिल्लाते रह गये कि हमारी न्याय-व्यवस्था उत्तम है, हमारे सिर पर तुम्हें संस्कारित करने का भार है, हम तुमको आधुनिक शिक्षा के दर्शन करा रहे है, आदि; और हमने कह दिया कि हमे कुछ नहीं सुनना | वैसे ही अब करने की बारी है |

भारतीय संविधान उनके हजारों वर्षों से अधर्म पूर्वक कमाये धन-सम्पत्ति की सुरक्षा करने का बीडा उठाते हुए हमें धन-सम्पत्ति में उनके समान न हो पाने के लिये बाध्य किये हुए है | इसके बदले में आरक्षण देना तो लालीपाप जैसा है | तुम्हारी प्रतिभा की महानता तब समझ में आये जब तुम हमारे बराबर आकर दौडना शुरू करो | तुम्हारी प्रतिभा के आगे हम नतमस्तक होंगे यदि तुम भी अपने पैरों में बेडी डालकर मेरे साथ दौडो और मुझसे आगे निकल जाओ |

Anonymous said...

मेरी नजर मे आरक्षण का एक ही विकल्प है कि सबको बलपूर्वक आर्थिक बराबरी पर ला दो. फिर बिना किसी आरक्षण के सबको अपना-अपना भविष्य बनाने दो.

जहाँ तक प्रतिभा का सवाल है, यह एक बहुआयामी चीज है. इसको इतनी आसानी से नहीं मापा जा सकता जितनी आसानी से आजकल मापते हैं. किसी परीक्षा मे अधिक अंक पा लेना प्रतिभा के बहुत सारे आयामों में से केवल एक है. बाकी आयामों की तो उनको परवाह ही नहीं है.

pragya said...

I am sorry but i donot agree with you. You could conveniently blame my belonging to the evil caste for this. I donot believe in caste and religion but when my caste is so evil I think I need to happily stick by the this evil caste.
My one suggestion to u Srijan is that you must go by your beliefs. Next time when you need medical attention please go by the caste and not the skill and knowledge of the doctor. When you build your house, go by caste and not the skill. When you send your child to school go by the caste of teachers.When you read a book, please go by the caste of the author not by his/her writing skills. The list may go on. Yes, try and get your vehicle repaired by some one of the right caste.
If u follow my suggestions, I would pray for your safety and happiness.
With regrets,
Your friend from the evil caste ,
Pragya.

Srijan Shilpi said...

Pragya, You may please like to go through an article by Priti Choudhary published at Editorial Page of Rashtriya Sahara on 26th April, 2006 for the suitable reply of your comments. A link for the article is available at http://www.rashtriyasahara.com/20060427/editorial.htm#200604272

रजनीश मंगला said...

बहुत अच्छा।

Anonymous said...

प्रज्ञा,

जिन डाक्टरों, इन्जीनियरों और अन्य का नाम लेकर तुम इतरा रही हो, उनके लिय कितने असहाय लोगों ने बलिदान दिया है, कितने गरीब लोगों ने स्वयं भूखे रहकर उनको परोक्ष रूप से "वर्ड-क्लास" सुविधा प्रदान करायी, इन बातों की आप कल्पना ही नही कर पा रही हो | कारण साफ है कि ये चीजें आम आँखों से नही दिखायी देतीं, इनके लिये बुद्धि की आँखों की जरूरत होती है |
इन लोगों के उपर आम जनता का कर्ज है, जिनके अड्र्श्य योगदान के कारण ही वे अपनी वर्तमान अवस्था को प्राप्त कर सके | इसलिये इनकी सेवाओं के लिये इतराओ मत ; इनकी सेवायें लेना हमारा अधिकार है | अपनी सेवायें हमको प्रदान करना इनका धर्म है, कर्तव्य है |

pragya said...

hi anonymous,
its so easy to pass judgements on others.why should i be proud of anything? i am neither an engineer, nor a doctor nor anything else worth mentioning.iam just an average humanbeing. i just stated my opinion.u have a right to disagree with me,just as i have to not like the idea of any reservations.
is it not about time we forgot about caste and religion and got on with the serious business of life?if you do not agree then you are most welcome to hang onto it for eternity.

all the best.
prgya.

Srijan Shilpi said...
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Srijan Shilpi said...

वागर्थ के अक्तूबर, 2004 अंक में प्रकाशित विद्या लाल की लघु कथा 'आरक्षण' सामाजिक वास्तविकता की सही तस्वीर प्रस्तुत करती है। आप भी पढ़ना चाहेंगे। लिंक नीचे दिया गया है:
http://vagarth.com/october/laghu-katha/index.htm

Raman Kaul said...

सृजन शिल्पी said...
Pragya, You may please like to go through an article by Priti Choudhary published at Editorial Page of Rashtriya Sahara on 26th April, 2006 for the suitable reply of your comments. A link for the article is available.. (here)


सृजन शिल्पी जी, मैं ने आप के द्वारा सुझाया गया प्रीति चौधरी का लेख पढ़ा, पर उस में प्रज्ञा के एक भी प्रश्न का उत्तर नहीं मिला। प्रज्ञा किसी डाक्टर, इंजीनियर का नाम लेकर इतरा नहीं रही थीं, केवल यह पूछ रही थीं कि क्या आप अस्पताल में भर्ती होने पर यह चाहेंगे कि आप का इलाज कोई जाति विशेष का ही डाक्टर करे? क्या आप मकान, पुल या कार बनवाते समय जाति को देखेंगे? इन प्रश्नों का उत्तर न प्रीति ने दिया, न आप ने। यह इतना संवेदनशील और विभाजक विषय है कि किसी को नाराज़ किए बिना कुछ कह पाना मुश्किल है। पर आप ने स्वयं ही अपने पोस्ट के आरंभ में आरक्षण के विरुद्ध जो तर्क दिए हैं, वे सही हैं। आप का प्रश्न भी सही है कि फिर विकल्प क्या है। मेरे विचार में आरक्षण विकल्प नहीं है, हाँ सही उत्तर भी नहीं है मेरे पास। दो ग़लत मिल कर एक सही नहीं होते। बात है किसी और उपाय पर ध्यान केन्द्रित करने की -- बात है, खंभे को मज़बूत बनाने की, न कि कमज़ोर खंभे पर इमारत बनाने की। सभी को बराबर शिक्षा मिले, इस की। उच्च शिक्षा और निजी उद्योग के बदले शायद ज़रूरत है निजी स्कूलों में सब की पहुँच की, और सरकारी स्कूलों को ज़िन्दा करने की। आर्थिक सहायता की, ताकि सब बराबरी के काबिल बनें, न कि ग़ैर-बराबर को जबरन बराबर किया जाए। सिस्टम का ग़लत फायदा उठाने वाले दोनों तरफ़ हैं, और शायद वही नीति निर्धारण भी करते हैं।

Deodutt said...

Mr. Raman Kaul,
Reservation is not an alternative. It is a constitutional obligation provided by the Constitution of India and devised by Parliament of India and endorsed by Supreme Court of India.

Are you ready to follow any of the suggestions made by Srijan Shilpi in the concluding paragraph of his article?

pragya said...

My Dear Srijan,
The quota debate goes on, though, the decision has been taken by the Govt. I must congratulate you about the Govt's decision, though, i am disappointed, not that i cld hope for the outcome to be otherwise.
Somehow, your blog and a few responses to it have deeply agitated me. Maybe, the reason for this is the fact that you are my friend and what you think matters more to me than what some faceless journalists say and think.
I donot want to get into any debate on this as your views are firm and no amount of debating is going to change them. I just want to share a few of my experiences and maybe, you would realise that some or maybe a lot more people from the so called privileged classes have similar life stories.
My grandparents and parents were no privileged people. The women of the family worked on the fields and cut grass for the cattle they owned.The men worked on the fields and if they were lucky enough they worked outside the village and sent money home.My father used to walk miles, how many I donot remember, but suffice it to say that he had to leave home for school while it was yet not dawn. He had no shoes, no money. He completed his matriculation in this manner. Despite being a bright student, the lack of funds and the image of his father's bent back while working in the field and carrying grass, forced him to take up a job.
All his life he worked hard as a clerk. I remember him as a very respected member of society just because he was kind hearted, hard working, principled,disciplined, religious and the most upright person I have ever known. He worked for a company which alloted quarters to its employees and fortunately for us each quarter had some land which could be used as a garden. I don't remember the castes of my neighbours as we were never caste conscious nor caste was ever a topic at home.(I earnestly request you to please send me a list of the castes that come under OBCs so that I may be enlightened at this late stage in my life.) But this much I do know that very few (almost none)had the usual castes associated with brahmins like Sharma , Pande, Tiwari, Tripathi etc. My father made use of that little piece of the garden to the hilt.Every morning he would work at it for hours and grew lots of vegetables. He was an artist with that little patch of land. He planned beautifully and we had almost all possible fruit trees at the periphery. None of whichever caste that lived there with similar patch of land ever bothered to work so hard at it. We almost completely depended on it for our fruits and vegetable needs.
My mother,the privileged lady, had studied upto class 2. After which she too had worked in the fields and cut grass till dad brought her to his workplace. But I am proud to say that she knows more about Hindi literature than most Hindi post graduates.How? Even when we could not afford new clothes we always had newspaper and magazines( Saptahik Hindustan,Dharmyug, Chandamama, Kalyan) subscribed. Mother even subscribed to Ghareloo Library Yojana which took away a princely sum or Rs 7 so that we could read about all the freedom fighters etc. Well these were our luxuries! Now that my mother lives in Maharshtra she has taught herself marathi and reads a marathi newspaper. Till my father's death she wore a mangalsutra which was a few black beads strung on a thread. I have seen the less privileged people wearing gold.
We were five children. I never remember my mother in any fancy saries. I remember my father's darned clothes. Yes darning was another art perfected by my father and mother.We studied in a school which was like any any govt school, except that it was run by the factory where dad worked.It was vernacular. we sat on the floor along with all the kids of clerks, workers, plumbers, electricians, sweepers and all those who worked there. I don't remember that I ever thought whose kid was sitting next to me. A lot of my class fellows work as drivers /cleaners on trucks that ply there and the rest as workers, plumbers and electricians etc in the same factory even today. I know of atleast one who became an engineer.
This school was upto 8th. After that we went to the nearby city.I never remember having more than one uniform. The only difference between us and the rest was that the 1st thing that I did on reching home was to wash it.The 1st thing that I did on waking up was to iron it.I never remember eating a thing, drinking a cup of tea in college canteen.Later when after retirement we were living in the city, I always walked it to college,never even took a bus even in the hot afternoon sun.
If we managed to not get spoilt inspite of our privileged background, it was thanks to my parents. The 1st and last time my brother used abusive language, my mom fasted and read the whole Ramayana as penance. If my brother had to take tutions to survive in his prestigious college and its hostel , that too was his privilege. Now u ppl are so kind as to see to it that we and those of our kind do not have to go through such painful experiences. We can go back to tending our cattle. That would be our just deserts too as in some previous birth we harmed some OBCs or DEFs or whoever.The trouble is I don't know who they are.
Anyway, actually, that would never happen.Do what you and people of Lalu's ilk do, we would still come through. If not as doctors and engineers then as BPO employees.Those who work hard and intelligently enough would be successfull even reprocessing the garbage. So i have no fear. By the way, what caste do people of mixed marriages fall into? Do not tell me the father's. I am a bit of a feminist. My children have no caste. I have, but I have never cared much about it.
Frankly speaking, I do not know why am saying all this to you.
But anyway, now I have unburdened myself a bit, so will send this to u.
One in the opposing camp,
Pragya.
PS: Srijan,this was supposed to be a private letter,but I am ready to share it with others who may understand(in case they have the capability to do so)my view point.
Pragya.