Monday, March 13, 2006

समीक्षा: 'शब्दभंग' (मारीशस का हिन्दी उपन्यास)

व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार से लड़ने की आदर्शवादी चाह और साथ ही व्यक्तिगत जीवन में उन्नति के सोपान चढ़ने व अपने प्रियजनों के लिए सुख-सुविधा हासिल करने की महत्वाकांक्षा के द्वंद्व के कारण जिंदगी किस तरह बीहड़ और खतरनाक परिस्थितियों में उलझ जाती है और कई बार तमाम संघर्ष व कष्ट के बाद भी अंतत: हार और हताशा ही हाथ लगती है, इस कथानक को समकालीन दौर के साहित्य, रंगमंच व फिल्म में कई बार अपने-अपने तरह से दोहराया गया है। यथार्थ की ओर नई-नई भंगिमाओं के साथ बढ़ती साहित्यिक चेतना अब ‘सत्यमेव जयते’ के शाश्वत सिद्धांत का आग्रह किए बगैर जनजीवन में घट रही घटनाओं की निराशाजनक तस्वीर को यथातथ्य प्रस्तुत करने में हिचकती नहीं है। अपने हिन्दी उपन्यास ‘शब्दभंग’ में भी मारीशसवासी चर्चित लेखक अभिमन्यु अनत ने सच की एकल किंतु निर्भीक आवाज को भ्रष्ट व क्रूर सत्ता द्वारा खामोश कर दिए जाने की इसी पीड़ादायी हक़ीक़त को बेबाकी ढंग से प्रस्तुत किया है। यह उपन्यास भले ही मारीशस के आम हालात को प्रतिबिंबित करने के लिए लिखा गया हो, लेकिन भारतीय और खासकर हिन्दी पाठकों को भी हर क्षण भारतीय ही लगता है- सांस्कृतिक दृष्टि से तो स्वाभाविक रूप से, लेकिन राजनीतिक-आर्थिक हालात की समानता की दृष्टि से। वैसे भी, मारीशस हमारे लिए विदेश नहीं है, बल्कि उसे हम हिन्द महासागर में बसे छोटे-से हिन्दुस्तान के रूप में ही देखते-मानते आए हैं। मारीशस के साथ हमारा नाभि-नाल का प्राकृतिक व सहज संबंध है और रहेगा। खूंखार अपराधी माफिया, राजनेताओं के संरक्षण में अवैध गतिविधियों में लिप्त उद्योगपति, रक्षक के बजाय भक्षक बन चुकी पुलिस, सिफारिश व रिश्वत के आधार पर काम करने वाला प्रशासन, भ्रष्ट न्यायपालिका, सनसनी फैलाकर अपनी प्रसार संख्या बढ़ाने और सत्ता के दबाव में आकर या उससे सुविधा पाने की चाह में ऐन वक्त पर घुटने टेक देने वाला प्रेस-मीडिया और इन सबके अपवित्र गठजोड़ के बल पर सत्ता के शीर्ष पर काबिज राजनेताओं की करतूतें चाहे भारत की हों या मारीशस की, हमारे लिए नई नहीं हैं। भ्रष्टाचार आज पूरी दुनिया की राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में ओतप्रोत हो गया है और हम पाते हैं कि इसकी गंगोत्री अकसर व्यवस्था के शीर्ष स्तर पर होती है। कभी-कभी कोई ईमानदार पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी अथवा कोई प्रतिबद्ध पत्रकार या ऐसा ही कोई जोशीला युवक महान आदर्शों से प्रेरित होकर या फिर स्वयं इस व्यवस्था से उत्पीड़ित होने के बाद प्रतिशोध लेने के लिए इस भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ जंग का ऐलान करता भी है तो वह अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में घिरकर अकाल मौत की नियति से गुजरने के लिए अभिशप्त हो जाता है। अधिकतर व्यक्तियों का आदर्शवादिता का यह भूत लोभ की मरीचिका और भय की ज्वालामुखी के कारण तुरंत ही विदा हो जाता है और आदमी को व्यवहारिकता व दुनियादारी के ठोस धरातल पर ला पटकता है। लेकिन कुछ लोग शायद एक अलग ही मिट्टी के बने होते हैं और अपना जीवट अंत तक बनाए रखते हैं। ऐसे लोगों का हश्र प्राय: उपन्यास के नायक रोबिन की तरह होता है। उसकी मौत अख़बार के छपते-छपते कॉलम में ‘शहर में एक रहस्यमयी दुर्घटना’ शीर्षक के अंतर्गत एक छोटी-सी दो पंक्ति की खबर बनकर रह जाती है और उसी के साथ भ्रष्ट व्यवस्था के असली चेहरों को बेनकाब करने वाली सारी रहस्यमयी जानकारियाँ और सारे सबूत भी हमेशा के लिए विलुप्त हो जाते हैं। इस तरह अन्याय, अधर्म और असत्य की (कु)व्यवस्था बदस्तूर जारी रहती है। कथानक की प्रकृति के कारण पूरे उपन्यास में शुरू से आखिर तक रहस्य और उत्सुकता का भाव बना रहता है। लेकिन अंत जिस अकस्मात ढंग से होता है, उससे एक धक्का-सा लगता है। शायद उपन्यासकार का यही उद्देश्य भी रहा हो, क्लाइमेक्स पर ले जाकर एक विस्फोट के साथ कथा का अंत करना। इसीलिए उपन्यास का नाम शब्दभंग रखा भी गया है। लेकिन इस अचानक अंत के बाद अगर उम्मीद की कोई किरण उपन्यासकार दिखाने से चूक जाए तो फिर उपन्यास का निहितार्थ क्या रहा? क्या षडयंत्रकारी राजनेताओं, माफिया अपराधियों का असली चेहरा दिखाना ही मक़सद है? भला उनके असली चेहरे से कौन पहले से वाक़िफ़ नहीं? अगर रोबिन सबूतों के साथ गुनहगारों के असली चेहरे बेनकाब कर भी देता तो व्यवस्था में भला कौन-सा बदलाव आ जाता? प्रेस या मीडिया अगर बहुत हिम्मत से काम करे तो किसी राजनेता की छवि को तो धूमिल कर सकता है, लेकिन उसे उसके गुनाहों की सज़ा दिलवाने में कामयाब हो जाए, यह उसके बूते से बाहर है। जनता की याददाश्त क्षणिक होती है। वह सब देखा-सुना भूल जाती है और फिर से उन्हीं लोगों को अपना प्रतिनिधि चुन लेती है। जिनके हाथ में सत्ता है और जिन लोगों ने सत्ता को अपने कब्जे में हथियाए रखने के लिए पूरी व्यवस्था के चरित्र को गंदला कर दिया है, उनका ऐसे एकाकी प्रयासों से कुछ खास बिगाड़ा नहीं जा सकेगा। दरअसल जरूरत बेहतर और सम्यक वैकल्पिक व्यवस्था का ढाँचा बनाने की है। इसके लिए संगठित और योजनाबद्ध ढंग से पूरी प्रतिबद्धता और सूझबूझ के साथ एक दीर्घकालीन एजेंडे के तहत गतिशील व निष्ठावान प्रयासों की जरूरत है। रोबिन जैसे एकाकी लोग नीचे से लेकर ऊपर तक व्यवस्था की सड़ांध को मिटाकर उसमें सुगंधि नहीं ला सकते। वह इसमें सक्षम भी नहीं है। वह अपने काम में कुशल और ईमानदार तो है, लेकिन इतनी लंबी और बड़ी लड़ाई के लिए तैयार और तत्पर नहीं है।

4 comments:

srijansamman said...

समीक्षा मैंने पढ़ी । मारीशस अपने आप में एक संपूर्ण भारत है । आपने यह समीक्षा देकर हिन्दी की वैश्विक क्षितिज तक अपनी दृष्टि पहुँचायी है। बधाईयाँ । क्या आप कभी वहाँ गये हैं । किसी साहित्यिक यात्रा में । अपने बारे में बतायेंगे ।
जयप्रकाश मानस

Srijan Shilpi said...

अपने बारे में फिर कभी। ई-लेखन की दुनिया के लिए मैंने 'सृजन शिल्पी' नाम ही अपनाया है। किसी साहित्य सम्मेलन में मारीशस जाने का अवसर अभी तक मिला नहीं। जो मित्र-परिचित गए हैं उनकी जुबानी वहाँ के संस्मरण सुने हैं। पढ़ा खूब है मारीशस के बारे में। आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद।

vinaye said...

अभिमन्यु अनत पर लिखे आपके विचार पढ़ा। बहुत अच्छा लगा। दरअसल व्यवस्था सम्बन्धी जिन समस्याओं को अनत ने उकेरा है वे तो आज सार्वभौमिक बन गई हैं। और संघर्ष करने वाले रोबिन जैसे लोग नगण्य से होते जा रहे हैं। अनत कुछ इन्हीं समकालीन सामाजिक विसंगतियों को इतनी जीवंत्ता से हमारे सामने रखते है कि कोई भी इनसे झकझोरे बिना नहीं रह सकता। यदि रह सकता है कोई तो वो संवेदनहीनता व असामाजिकता की गर्त में पड़ा हुआ ‘प्राणी’ (यदि कहा जा सकता है तो!) होगा। बधाई आपको। मॉरीशस से विनय गुदारी

Srijan Shilpi said...

@ विनय गुदारी जी,

बहुत-बहुत शुक्रिया, आपकी टिप्पणी के लिए। अच्छा लगा मारीशस से एक सुधी पाठक की प्रतिक्रिया पाकर।