Wednesday, July 26, 2006
सृजन शिल्पी का स्थायी पता
Monday, July 24, 2006
चिट्ठाकारिता और उसकी प्रकृति
पारंपरिक लेखन में लेखक और पाठक के बीच प्रकाशक, विक्रेता और समीक्षक आते हैं। प्रकाशक और विक्रेता जहाँ लेखन से होने वाले मुनाफ़े को हड़पने के कारोबार में माहिर होते हैं, वहीं समीक्षक लेखन के मानक और लेखक के स्तर को कृत्रिम ढंग से निर्धारित करने के खेल के उस्ताद। यहाँ तक कि अंतर्जाल (इंटरनेट) आने के बाद जब वेबसाइटों के माध्यम से लेखक और पाठक के बीच की दूरी को मिटाने की क्रांतिकारी कोशिश शुरू हुई तब भी वेब प्रकाशन की तकनीकी जटिलता के कारण वेब डिजाइनरों और वेब डेवलपरों की सेवाओं का सहारा लेना आवश्यक ही रहा। वर्ष 1997 में ब्लॉग के आने के बाद से लेखक और पाठक के बीच मध्यस्थ की भूमिका लुप्त हो गई। मुनाफ़ा और मानक का तत्व हट जाने, लेखन का सहज रूप से तत्क्षण प्रकाशित हो जाने की सुविधा मिल जाने और पाठक के बीच पैठ बना सकने के लिए पेशेवर विशेषज्ञता आवश्यक नहीं रह जाने के कारण पारंपरिक लेखन की गंभीरता और औपचारिकता से अलग ब्लॉग लेखन की एक नई शैली के विकास का माध्यम बना, जिसकी प्रकृति अनौपचारिक, सामूहिक, परस्पर संवादी और लोकतांत्रिक है। …… (क्रमश:)एक आदमी रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है
न रोटी खाता है
वह सिर्फ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ कि
यह तीसरा आदमी कौन है
मेरे देश की संसद मौन है।
Friday, June 23, 2006
क्या करें ?
कुछ वर्ष पहले मैंने क्या करें (What to do) नामक एक उपन्यास पढ़ा था, जिसके लेखक मशहूर रूसी लेखक निकोलाई चेर्नीशेव्स्की हैं। यह दुनिया की कुछ चुनिंदा किताबों में से है। यह लेनिन और महात्मा गाँधी की सबसे प्रिय किताबों में से थी। इस उपन्यास में रहमेतोव, लोपुखोव और किरतानेव जैसे उदात्त नायकों की परिकल्पना की गई है जो नए और परिष्कृत मानव के आदर्श को निरूपित करते हैं। इसका महत्व इस दृष्टि से अधिक है कि बीसवीं सदी में कई ऐसे महापुरुष वास्तव में हुए जो उन्नीसवीं सदी में चेर्नीशेव्स्की द्वारा की गई परिकल्पना से भी कहीं अधिक महान साबित हुए। मेरा अपना विश्वास है कि इक्कीसवीं सदी में भी कुछ ऐसे महामानव अवश्य उभर सकेंगे जो अब तक के इतिहास में दर्ज महामानवों से भी कहीं अधिक महान सिद्ध होंगे।
उक्त उपन्यास की भूमिका में बताया गया है, “जीवन की सच्चाई को चेर्नीशेव्स्की साहित्यिक रचना की मूल कसौटी मानते थे और उनका यह उपन्यास इस कसौटी पर खरा उतरता है। इस उपन्यास का सर्वोपरि लक्ष्य लोगों के लिए सच्चे अर्थों में सच्ची मानवीय नैतिकता और सच्चे अर्थों में आध्यात्मिकता से समृद्ध जीवन का प्रचार करना है। यह राजनीतिक, सामाजिक और दार्शनिक उपन्यास...वास्तव में प्रेम की पुस्तक है। प्यार-मुहब्बत का उपन्यास नहीं, बल्कि सच्चे अर्थों में प्रेम की पुस्तक जो यह बताती है कि असली, सच्चा प्यार क्या होता है और लोगों को मानव की तरह जीने और प्रेम करने के लिए किस चीज की जरूरत है। यह पुस्तक मनोरंजन और मनबहलाव के लिए नहीं है। यह परिपक्व और चिंतनशील पाठक के लिए है।” लेनिन ने इस उपन्यास के संबंध में लिखा है, "चेर्नीशेव्स्की का यह उपन्यास इतना जटिल और गहन है कि उसे अल्पायु में समझना असंभव है। मैंने खुद, जहाँ तक याद है, 14 वर्ष की आयु में उसे पढ़ने की कोशिश की थी। तब यह व्यर्थ, सतही पठन था। पर बड़े भाई को मृत्युदंड दिए जाने के बाद मैंने उसे फिर से ध्यान से पढ़ने का फैसला किया क्योंकि मुझे मालूम था कि क्या करें उपन्यास मेरे भाई की प्रिय पुस्तक था। और तब मैं उसे कई दिन नहीं, कई सप्ताह तक पढ़ता रहा। तभी मैं उसकी गहराई को समझा। यह एक ऐसी पुस्तक है जो आजीवन उत्साह प्रदान करती है।" चेर्नीशेव्स्की ने स्वयं अपने लेखन के बारे में लिखा है, “मुझमें रत्ती भर साहित्यिक प्रतिभा नहीं है। मेरी रूसी भी बहुत बुरी है। कोई बात नहीं—पढ़ते जाइए, भले लोगों, आप देखेंगे कि आपका समय व्यर्थ ही नष्ट नहीं हुआ। सत्य अत्यंत गौरवशाली ध्येय है, और जो लेखक इस ध्येय की सेवा करता है उसके सारे दोषों का विमोचन हो जाता है।...मेरी कहानी में जो भी गुण हैं उनमें से एक-एक सत्य और केवल सत्य की बदौलत है।” प्रस्तुत है इस उपन्यास से कुछ महत्वपूर्ण पंक्तियाँ जो मैंने उपन्यास पढ़ते समय अपनी डायरी में लिख ली थीं:
- मानव के लिए अपने कृत्य की सच्चाई, विवेकपूर्णता और नैतिकता की अनुभूति से अधिक बड़ा नैतिक लाभ नहीं होता है।
- अच्छी जिंदगी केवल कमीनों के लिए होती है, उनके लिए नहीं जो ईमानदार हैं।
- प्रेम के बिना एक भी चुम्बन मत देना किसी को, भले ही तुम्हें मर ही जाना क्यों न पड़े!
- कोई भी मनुष्य अपने अस्तित्व को कुंठित किए बिना अकेला नहीं रह सकता। या तो निर्जीव बन जाओ अथवा नीचता से समझौता कर लो।
- आप जिस व्यक्ति से प्रेम करती हैं, उसे ऐसा कोई काम अपने लिए करने की अनुमति नहीं देंगी, जिसे वह संभवतया अरुचिकर माने, वह आपके लिए तनिक-सा भी त्याग करे अथवा जरा-सी भी रियायत दे, उससे पहले आप मर जाना पसंद करेंगी। यही भाषा है अनुराग की, यही है प्रेम। यदि कोई अनुराग कुछ और बतलाता है तो यह निपट वासना है, जिसका प्रेम से कोई वास्ता नहीं।
- जरा से भी तर्क अनुभव से संपन्न किसी निष्कपट साधारण व्यक्ति को धोखा देना बहुत कठिन काम है।
- माल संभालकर रखो, चोर को बेकार ललचाओ मत।
- सिद्धांत चाहे जितना भी नीरस क्यों न हो यह जीवन के सबसे सच्चे मूल-स्रोत से उसका साक्षात्कार कराता है और काव्य का निवास तो सचाई में ही होता है।
- कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होता, जिसके चरित्र में ऐसा कुछ न हो जो निष्कलंक है।
Wednesday, June 21, 2006
अर्धनारीश्वर और वाणभट्ट की आत्मकथा
इटली निवासी चिट्ठाकार मित्र सुनील जी ने अपने चिट्ठे पर प्रकाशित लेख ‘मैं शिव हूँ’ में मेरी एक टिप्पणी का उल्लेख करते हुए मुझसे हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास ‘वाणभट्ट की आत्मकथा’ के आधार पर किसी व्यक्ति में पुरुष और स्त्री के द्वंद्व का भारतीय दर्शन के दृष्टिकोण से विश्लेषण करने का अनुरोध किया है। उनके अनुरोध को ध्यान में रखते हुए उक्त उपन्यास को मैंने एक बार फिर से पढ़ा। उपन्यास में वर्णित दर्शन की व्याख्या से पहले इस उपन्यास के प्रासंगिक अंशों को उद्धृत कर देना मैं अधिक उपयुक्त समझता हूँ। उपन्यास के इन अंशों में आए संवाद इतने जीवंत और मर्मभेदी हैं कि वे पाठकों के समक्ष अपने आशय को स्वत: स्पष्ट कर देते हैं। फिर भी, यदि सुनील जी एवं अन्य पाठक चाहेंगे तो अगली प्रविष्टि में इसके दर्शन की व्याख्या करने का प्रयास करूँगा।
[1]
“एक बात पूछूँ, माता?”
“पूछो।”
“बाबा ने कल मुझसे जो कुछ कहा, उसका क्या अभिप्राय है?”
“बाबा से अधिक मैं क्या बता सकती हूँ।”
“प्रवृत्तियों की पूजा करने का क्या तात्पर्य हो सकता है?”
“बाबा ने क्या कहा है?”
“बाबा ने कहा है कि प्रवृत्तियों से डरना भी गलत है, उन्हें छिपाना भी ठीक नहीं और उनसे लज्जित होना बालिशता है। फिर उन्होंने कहा है कि त्रिभुवन-मोहिनी ने जिस रूप में तुझे मोह लिया है, उसी रूप की पूजा कर, वही तेरा देवता है। फिर विरतिवज्र से उन्होंने कहा—इस मार्ग में शक्ति के बिना साधना नहीं चल सकती। ऐसी बहुत-सी बातें उन्होंने बताईं जो अश्रुतपूर्व थीं। क्यों अंब, शक्ति क्या स्त्री को कहते हैं? और स्त्री में क्या सचमुच त्रिभुवन-मोहिनी का वास होता है?”
“देख बाबा, तू व्यर्थ की बहस करने जा रहा है। बाबा ने जो कुछ कहा है वह पुरुष का सत्य है। स्त्री का सत्य ठीक वैसा ही नहीं है।”
“उसका विरोधी है, मात:?”
“पूरक है रे! पूरक अविरोधी हुआ करता है!”
“मैं समझ नहीं सका।”
“समझ जाएगा, तेरे गुरु प्रसन्न हैं, तेरी कुंडलिनी जाग्रत है, तुझे कौल-अवधूत का प्रसाद प्राप्त है, उतावला न हो। इतना याद रख कि पुरुष वस्तु-विच्छिन्न भावरूप सत्य में आनंद का साक्षात्कार करता है, स्त्री वस्तु-परिगृहीत रूप में रस पाती है। पुरुष नि:संग है, स्त्री आसक्त; पुरुष निर्द्वंद्व है, स्त्री द्वंद्वोन्मुखी; पुरुष मुक्त है, स्त्री बद्ध। पुरुष स्त्री को शक्ति समझकर ही पूर्ण हो सकता है; पर स्त्री, स्त्री को शक्ति समझकर अधूरी रह जाती है।”
“तो स्त्री की पूर्णता के लिए पुरुष को शक्तिमान मानने की आवश्यकता है न, अंब?”
“ना। उससे स्त्री अपना कोई उपकार नहीं कर सकती, पुरुष का अपकार कर सकती है। स्त्री प्रकृति है। वत्स, उसकी सफलता पुरुष को बाँधने में है, किंतु सार्थकता पुरुष की मुक्ति में है।” मैं कुछ भी नहीं समझ सका। केवल आँखें फाड़-फाड़कर महामाया की ओर देखता रहा। वे समझ गईं कि मैंने कहीं मूल में ही प्रमाद किया है। बोलीं, “नहीं समझ सका न? मूल में ही प्रमाद कर रहा है, भोले! तू क्या अपने को पुरुष समझ रहा है और मुझे स्त्री? यही प्रमाद है। मुझमें पुरुष की अपेक्षा प्रकृति की अभिव्यक्ति की मात्रा अधिक है, इसलिए मैं स्त्री हूँ। तुझमें प्रकृति की अपेक्षा पुरुष की अभिव्यक्ति अधिक है, इसलिए तू पुरुष है। यह लोक की प्रज्ञप्तिप्रज्ञा है, वास्तव सत्य नहीं। ऐसी स्त्री प्रकृति नहीं है, प्रकृति का अपेक्षाकृत निकटस्थ प्रतिनिधि है और ऐसा पुरुष प्रकृति का दूरस्थ प्रतिनिधि है। यद्यपि तुझमें तेरे ही भीतर के प्रकृति-तत्व की अपेक्षा पुरुष-तत्व अधिक है; पर वह पुरुष-तत्व मेरे भीतर के पुरुष-तत्व की अपेक्षा अधिक नहीं है। मैं तुझसे अधिक नि:संग, अधिक निर्द्वंद्व और अधिक मुक्त हूँ। मैं अपने भीतर की अधिक मात्रावाली प्रकृति को अपने ही भीतरवाले पुरुष-तत्व से अभिभूत नहीं कर सकती। इसलिए मुझे अघोरभैरव की आवश्यकता है। जो कोई भी पुरुष प्रज्ञप्तिवाला मनुष्य मेरे विकास का साधन नहीं हो सकता।”
“और अघोरभैरव को आपकी क्या आवश्यकता है?”
“मुझे मेरी ही अंत:स्थिता प्रकृति रूप में सार्थकता देना। वे गुरु हैं, वे महान हैं, वे मुक्त हैं, वे सिद्ध हैं। उनकी बात अलग है।”
(षष्ठ उच्छ्वास से)
[2]
महामाया ने ही फिर शुरू किया—“तो तू मेरी बात नहीं मानती। हाँ बेटी, नारीहीन तपस्या संसार की भद्दी भूल है। यह धर्म-कर्म का विशाल आयोजन, सैन्य-संगठन और राज्य-व्यवस्थापन सब फेन-बुदबुद की भाँति विलुप्त हो जाएँगे; क्योंकि नारी का इसमें सहयोग नहीं है। यह सारा ठाठ-बाट संसार में केवल अशांति पैदा करेगा।”
भट्टिनी ने चकित की भाँति प्रश्न किया—“तो माता, क्या स्त्रियाँ सेना में भरती होने लगें, या राजगद्दी पाने लगें, तो यह अशांति दूर हो जाएगी?”
महामाया हँसी। बोलीं, “सरला है तू, मैं दूसरी बात कह रही थी। मैं पिंडनारी को कोई महत्वपूर्ण वस्तु नहीं मानती। तुम्हारे इस भट्ट ने भी मुझसे पहली बार इसी प्रकार प्रश्न किया था। मैं नारी-तत्व की बात कह रही हूँ रे! सेना में अगर पिंड-नारियों का दल भरती हो भी जाए तो भी जब तक उसमें नारी-तत्व की प्रधानता नहीं होती, तब तक अशांति बनी रहेगी।”
मेरी आँखें बंद थीं, खोलने का साहस मुझमें नहीं था। परंतु मैं कल्पना के नेत्रों से देख रहा था कि भट्टिनी के विशाल नयन आश्चर्य से आकर्ण विस्फारित हो गए हैं। ज़रा आगे झुककर उन्होंने कहा, “मैं नहीं समझी।”
महामाया ने दीर्घ नि:श्वास लिया। फिर थोड़ा सम्हलकर बोलीं, “परम शिव से दो तत्व एक ही साथ प्रकट हुए थे—शिव और शक्ति। शिव विधिरूप हैं और शक्ति निषेधरूपा। इन्हीं दो तत्वों के प्रस्पंद-विस्पंद से यह संसार आभासित हो रहा है। पिंड में शिव का प्राधान्य ही पुरुष है और शक्ति का प्राधान्य नारी है। तू क्या इस मांस-पिंड को स्त्री या पुरुष समझती है? ना सरले, यह जड़ मांस-पिंड न नारी है, न पुरुष! वह निषेधरूप तत्व ही नारी है। निषेधरूप तत्व, याद रख। जहाँ कहीं अपने-आपको उत्सर्ग करने की, अपने-आपको खपा देने की भावना प्रधान है, वहीं नारी है। जहाँ कहीं दु:ख-सुख की लाख-लाख धाराओं में अपने को दलित द्राक्षा के समान निचोड़कर दूसरे को तृप्त करने की भावना प्रबल है, वहीं नारी-तत्व है, या शास्त्रीय भाषा में कहना हो, तो शक्ति-तत्व है। हाँ रे, नारी निषेधरूपा है। वह आनंद-भोग के लिए नहीं आती, आनंद लुटाने के लिए आती है। आज के धर्म-कर्म के आयोजन, सैन्य-संगठन और राज्य-विस्तार विधि-रूप हैं। उनमें अपने-आपको दूसरों के लिए गला देने की भावना नहीं है, इसीलिए वे एक कटाक्ष पर ढह जाते हैं, एक स्मित पर बिक जाते हैं। वे फेन-बुदबुद की भाँति अनित्य हैं। वे सैकतसेतु की भाँति अस्थिर हैं। वे जल-रेखा की भाँति नश्वर हैं। उनमें अपने-आपको दूसरों के लिए मिटा देने की भावना जब तक नहीं आती, तब तक वे ऐसे ही रहेंगे। उन्हें जब तक पूजाहीन दिवस और सेवाहीन रात्रियाँ अनुतप्त नहीं करतीं और जब तक अर्ध्यदान उन्हें कुरेद नहीं जाता, तब तक उनमें निषेधरूपा नारी तत्व का अभाव रहेगा और तब तक वे केवल दूसरों को दु:ख दे सकते हैं।”
(एकादश उच्छ्वास से)
Friday, June 16, 2006
मेरा जन्म दिन और मूल नक्षत्र
आज, 16 जून को मेरा जन्म दिन है। यही मेरी वास्तविक जन्म तिथि है, हालाँकि आधिकारिक प्रयोजनों के लिए मेरी जन्म तिथि 3 जनवरी है। जे.एन.यू. में अपने अध्ययन काल में और उसके कुछ वर्षों बाद तक मैं 3 जनवरी को ही अपना जन्म दिन मनाया करता था जिसमें मेरे बहुत से घनिष्ठ मित्र शामिल होते थे। मेरी मित्र-मंडली में दिल्ली के विभिन्न न्यूज चैनलों एवं समाचार पत्रों में कार्यरत युवा पत्रकार और दिल्ली के विभिन्न शिक्षण संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे युवा लेक्चरर तथा भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में कार्यरत युवा अधिकारी शामिल हैं। इनमें से कई साथी 3 जनवरी को मेरे जन्म दिन पर अपने पेशे की तमाम व्यस्तताओं के बावजूद पार्टी में शामिल होने का समय निकाल लेते थे। लेकिन अब 3 जनवरी को घर पर जन्म-दिन की पार्टी रखने का वह सिलसिला भंग हो गया है।
मुझे अपनी वास्तविक जन्म-तिथि पहले ज्ञात नहीं थी। हाई स्कूल के सर्टिफ़िकेट में उल्लिखित जन्म-तिथि को ही मैं अपना जन्म-दिन मनाकर खुश हो लिया करता था। लेकिन दो वर्ष पहले जब विवाह के लिए पारिवारिक दबाव और रिश्तों के प्रस्तावों को टालना मेरे लिए मुश्किल हो गया तो मैंने अपनी जन्म-कुंडली बनाने की सोची। लेकिन प्रामाणिक जन्म-कुंडली के लिए जन्म की तारीख और समय का ज्ञान होना बहुत जरूरी है। जब मैंने जन्म से संबंधित विवरणों के बारे में अपने माँ-पिताजी से पूछा तो वे भी सटीक रूप से इसे याद नहीं कर पाए। पिताजी ने शायद इसे कहीं डायरी में लिख कर रखा था, लेकिन खोजने पर 1973 की वह डायरी नहीं मिल पाई। शायद वह मेरे गाँव में प्राय: हर वर्ष आने वाली बाढ़ की भेंट चढ़ गई होगी। इसलिए मेरे लिए अपना जन्म-दिन एक पहेली बन गया था, जिसे मैंने बहुत खोजबीन और ज्योतिषीय गणनाओं के बाद अब सुलझा लिया है। इसके लिए मुझे कुछ नामचीन ज्योतिषियों की भी मदद लेनी पड़ी।
16 जून की तारीख मूल नक्षत्र में पड़ती है, जिसमें जन्म लेने वाले लोग जन्म से दुर्भाग्यशाली लेकिन कर्म से दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने वाले माने जाते हैं। तुलसीदास का उदाहरण विश्वविख्यात है। ऐसी मान्यता है कि मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले अधिकांश जातक अपने परिवार के लिए शोक का कारण बनते हैं। मूल नक्षत्र के चार भागों में से पहले तीन भाग अशुभ माने जाते हैं। इस नक्षत्र के पहले भाग में जन्म लेने वाला जातक पिता के शोक अथवा मृत्यु का कारण बनता है, दूसरे भाग में जन्म लेने वाला जातक अपनी माता के शोक अथवा मृत्यु का कारण बनता है, जबकि तीसरे भाग में जन्म लेने वाला जातक पारिवारिक संपत्ति की गंभीर हानि का कारक होता है। मेरी नानी का देहांत मेरी छठी का संस्कार समाप्त होने के तुरंत बाद अचानक हो गया था। इसके आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि मेरा जन्म संभवत: मूल नक्षत्र के दूसरे भाग में हुआ होगा। मूल नक्षत्र के जातक को विरासत में कोई पैतृक संपत्ति प्राप्त नहीं होती। मूल नक्षत्र के जातकों की अन्य विशेषताओं के बारे में पढ़ने के बाद अपने जन्म-दिन के बारे में मेरी यह धारणा पुष्ट होती गई।
मूल नक्षत्र के जातक एक साथ कई क्षेत्रों में दिलचस्पी रखते हैं और उनमें विशेषज्ञता भी हासिल करते हैं और इसीलिए वे अपने कैरियर का क्षेत्र भी बारंबार बदलते रहते हैं। मेरे साथ तो यह प्रत्यक्ष ही हुआ है। पहले अध्यात्म, उसके बाद पत्रकारिता, फिर कार्यपालिका, उसके बाद विधायिका और अब न्यायपालिका के क्षेत्र में मेरी सक्रियता शायद मूल नक्षत्र में जन्म लेने के प्रभावस्वरूप ही बार-बार बदलती रही है। पिछले चार वर्ष में अपना कार्यस्थल मैं चार बार बदल चुका हूँ। बारंबार कार्यक्षेत्र बदलने के अपने नुकसान हैं जो मैं झेल रहा हूँ। मूल नक्षत्र के जातकों की एक बहुत बड़ी खामी यह है कि वे जिन बातों का उपदेश दूसरों को बहुत बेहतर ढंग से दे सकते हैं उनका पालन स्वयं अपने जीवन में कर पाना उनके लिए दुष्कर होता है। इसीलिए उन्हें सलाहकार की भूमिका के लिए अत्यंत उपयुक्त माना गया है। वैसे मूल नक्षत्र के अधिकतर जातक वक्ता, लेखक, दार्शनिक, आध्यात्मिक गुरु, वकील, राजनीतिज्ञ और डॉक्टर के रूप में अधिक सफल रहते हैं। जब मैं आत्मान्वेषण करता हूँ तो मुझे अपने अंदर इन सभी विशेषज्ञताओं के बीजांकुर मिलते हैं।
मैं सोचता हूँ कि ब्लॉग के माध्यम से मुझे अपने भीतर के उन बीजांकुरों को पल्लवित करने का मौका मिलेगा और शायद इसी तरह से मैं अपने जन्मजात दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित कर पाऊँगा। मानसी जी ज्योतिष शास्त्र की विशेषज्ञ हैं, शायद वह कुछ बेहतर प्रकाश डाल सकें। बहरहाल आप मुझे आज जन्म-दिन की बधाई दे सकते हैं, जिसकी शुरुआत इंडिया टी.वी. के पत्रकार और हिन्दी ब्लॉग जगत के सक्रिय साथी नीरज दीवान ने आज पहली बार अकस्मात सुबह-सुबह फोन पर बधाई देकर कर दी है। शायद यह टेलीपैथी का ही कमाल होगा, जिसके चमत्कारों में मेरा गहरा विश्वास है। उन्हें तो पहले से पता भी नहीं था मेरे जन्म दिन का। लेकिन जब मैं आज सुबह-सुबह यह पोस्ट लिख रहा था तो अनायास ही उनका फोन आ गया और उन्होंने बताया कि अभी-अभी जगा हूँ और आपकी याद आने लगी तो मैंने फोन कर दिया।
Tuesday, May 30, 2006
आरक्षण : विरोध के बावजूद
Monday, May 29, 2006
आरक्षण के समर्थन में मुखर अन्य प्रभावी स्वर
- हंस, जून, 2006
- The Hindu, 18 June, 2006
- Frontline, 03-16 June, 2006
- IBN Live.com, 10 June, 2006
- CNN-IBN, 10 June, 2006
Majority of Indians want quota
- Rediff.com, 10 June, 2006
Quotas and the notion of merit
- The Hindu, 9 June, 2006
Need for implementation of quota stressed
- The Times of India, 7 June, 2006
- The Hindu, 5 June, 2006
Upper castes dominate national media, says survey in Delhi
- The Hindustan Times, 5 June, 2006
- The Hindu, 3 June, 2006
Caste matters in the Indian media
- The Indian Express, 31 May, 2006
Goodwill, greed and the righting of history
- YAHOO India News/ANI, 28 May, 2006
'Journalists for Democracy' call for balanced reporting on quota issue
- Outlook India, 29 May, 2006
- दैनिक जागरण, 20 मई, 2006
- दैनिक जागरण, 11 मई, 2006
- The Times of India, 10 May, 2006
- The Telegraph, 9 May, 2006
Knowledge Commission divided on education reservation
- दैनिक हिन्दुस्तान, 8 मई, 2006
- The Telegraph, 29 अप्रैल, 2006
- राष्ट्रीय सहारा, 27 अप्रैल, 2006
आरक्षण : समान प्रतिस्पर्धा के भोथरे तर्क
- Counter Currents, 18 अप्रैल, 2006
Why Reservation For OBC Is A Must
- Ambedkar.org, 17 April, 2006
The Other Side of Merit & Mandal II
- The Hindu, 12 अप्रैल, 2006
Lessons from the new intolerance
- The Times of India, 11 April, 2006
Mandal-II: It's the age of pro-reservation bloggers
- Frontline, 22 Oct - 04 Nov, 2005
On reservations in the private sector
- वागर्थ, अक्तूबर, 2004
लघुकथा : आरक्षण
- Counter Currents, 22 June, 2004
Reservation For Dalits In Private Sector
नोट : इस संकलन में नई-नई कड़ियों को जोड़े जाने की प्रक्रिया जारी है। आप भी इस विषय पर अन्य महत्वपूर्ण कड़ियों की सूचना अपनी टिप्पणी सहित दे सकते हैं।
Saturday, April 22, 2006
आरक्षण बनाम योग्यता
मीडिया का दुरुपयोग करने से बचें यदि आप भारतीय संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखते हैं तो आपको आरक्षण के उस प्रावधान को लागू किए जाने का समर्थन करना चाहिए जिसे भारत की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार भारतीय संविधान के उपबंधों के दायरे में लागू करना चाह रही हो। यदि आपकी आस्था संविधान और लोकतंत्र में नहीं है तो फिर यह ध्यान रखिए कि आप आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान का विरोध भी इसीलिए कर पा रहे हैं क्योंकि भारतीय संविधान और लोकतंत्र ने ही आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार दिया है। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस्तेमाल के मुख्य माध्यम प्रेस और मीडिया पर अपने वर्चस्व की बदौलत यदि आप सरकार को संविधान के विपरीत दिशा में चलाने की कोशिश करना चाह रहे हों तो यह कोशिश आपको बहुत मंहगी पड़ सकती है, क्योंकि प्रेस और मीडिया का सारा कारोबार जिन पाठकों और दर्शकों के भरोसे पर टिका हुआ है उनका बहुमत संवैधानिक प्रावधानों का इस तरह मजाक बनाए जाते देखना पसंद नहीं करेगा और उनसे विमुख हो जाएगा। मीडिया के लोगों को इसकी बानगी उस दिन देखने को मिली जब एन.डी.टी.वी. द्वारा आरक्षण के मुद्दे पर आयोजित परिचर्चा में शामिल होने आए दर्शकों में से पिछड़े वर्ग के बहुत-से युवाओं ने कार्यक्रम के एकपक्षीय संचालन के विरोध में कार्यक्रम का बीच में ही बहिष्कार कर दिया और स्टूडियो से बाहर चले गए। बरखा दत्त ने इस घटना का जिक्र हिन्दुस्तान टाइम्स में संपादकीय पृष्ठ पर छपे अपने आलेख में भी किया। जो मीडिया जनमत का प्रतिनिधित्व नहीं करे और जब थोड़े से सवर्ण पत्रकार स्वयं को भारत का भाग्य विधाता समझकर अपने जातिगत स्वार्थ की पूर्ति और मिथ्या अभिमान की संतुष्टि के लिए संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक व्यवस्था का मजाक बनाने की कोशिश करें तो न केवल वे अपनी विश्वसनीयता गँवा देंगे, बल्कि जनता का बहिष्कार भी झेलने के लिए बाध्य हो जाएंगे। यदि आप वाकई आरक्षण के प्रावधान को लागू होने नहीं देना चाहते हैं तो मीडिया का गलत इस्तेमाल करने के बजाय आपको लोकतांत्रिक चुनाव के जरिए संसद में बहुमत हासिल करना चाहिए और संविधान में संशोधन करके आरक्षण के प्रावधान को हटा देना चाहिए।
क्या हो सकता है आरक्षण का विकल्प आरक्षण का एक कारगर विकल्प हमारे राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने सुझाया कि प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों और केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में जितनी सीटें आरक्षित की जा रही हों, कुल सीटों की संख्या उसी अनुपात में बढ़ा दी जानी चाहिए ताकि गैर-आरक्षित श्रेणी के लिए पहले की तरह अवसर उपलब्ध रहें। इस सुझाव का व्यापक स्वागत हुआ। सीटों की संख्या जितनी बढ़ाई जा सके उतनी बेहतर है ताकि अधिक से अधिक लोगों को उच्च शिक्षा हासिल करने का मौका मिल सके। आदर्श स्थिति तो वह होगी जिसमें हर शिक्षार्थी को पढ़ने को मौका मिले और हर बेरोजगार को रोजगार मिले। लेकिन चूंकि प्रत्याशी अधिक होते हैं और अवसरों की उपलब्धता काफी कम होती है, इसलिए प्रतियोगिता आयोजित कराई जाती है ताकि जो सबसे योग्य हों उन्हें ही सीमित अवसरों का लाभ मिल सके। लेकिन असमान सामाजिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि के प्रत्याशियों के बीच स्वस्थ प्रतियोगिता कदापि नहीं हो सकती। भारत में अभी तक ऐसी व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई है जिसमें किसी प्रतियोगिता के आयोजन से पहले हर प्रत्याशी को उसकी तैयारी के लिए समान सुविधा और समान परिस्थिति उपलब्ध हो सके। आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था में कृष्ण और सुदामा अब एक साथ नहीं पढ़ा करते और कोई कृष्ण अब किसी सुदामा का मित्र नहीं होता। यदि आप आरक्षण के प्रावधान को समाप्त करना चाहते हैं तो पहले आप ऐसी व्यवस्था विकसित कीजिए ताकि किसी प्रतियोगिता में भाग लेने वाले हर प्रतियोगी को समान सामाजिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि उपलब्ध हो सके।
क्या हैं योग्यता के मायने जब आप योग्यता की बात करते हैं और प्रतियोगिता के आयोजन के द्वारा उसका निर्धारण किए जाने की वकालत करते हैं तो पहली बात यह कि प्रतियोगिता का संचालन और योग्यता का निर्धारण करना भी आपके ही हाथों में रहा है, और आपने इसमें आज तक ईमानदारी नहीं दिखाई है। विशेषकर साक्षात्कारों के आधार पर योग्य प्रत्याशी का चयन किए जाने में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की कोई व्यवस्था नहीं होती। सचाई तो यह है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के बहुत से प्रत्याशियों को संवैधानिक उपबंधों के बावजूद आरक्षण के लाभ से लंबे समय तक वंचित ही रखा गया, क्योंकि जिन पदाधिकारियों के अधिकार-क्षेत्र में उन उपबंधों को लागू करने का दायित्व था, वे चाहते नहीं थे कि आरक्षित पदों पर अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोग भर्ती किए जाएँ। इसलिए वे फाइलों पर यह दर्ज करते रहे कि आरक्षित वर्गों के ‘उपयुक्त’ उम्मीदवार उपलब्ध नहीं होने के कारण उनके स्थान पर सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों की भर्ती कर ली गई। ऐसी नियुक्तियों के मामले में जो भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार चलता रहा, उसे उस दौर में सरकारी सेवा में रह चुका हर व्यक्ति जानता है। इस बारे में काफी विरोध होने पर बाद में ऐसे स्पष्ट प्रावधान किए गए ताकि आरक्षित रिक्त पदों को सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों से नहीं भरा जा सके। प्रतियोगिता के जरिए योग्यता के निर्धारण की प्रक्रिया का मुख्य आधार ‘पदानुक्रम’ (Hierarchy) और ‘सर्वोत्तम की उत्तरजीविता’ (Survival of the fittest) का सिद्धांत है। लेकिन आपने प्रतियोगिता के बजाय वर्ण-व्यवस्था के आधार पर पिछले हजारों वर्षों से योग्यता और श्रेष्ठता को अपना जन्मजात अधिकार समझकर समाज के बहुसंख्यक वर्गों को अपने अधीन बनाए रखा। प्रतियोगिता पर आधारित ‘सर्वोत्तम की उत्तरजीविता’ (Survival of the fittest) के सिद्धांत पर अमल करते हुए पहले तुर्कों-मुगलों ने और बाद में अंग्रेजों ने आपके जन्मजात अधिकार को चुनौती दी और आपकी योग्यता और श्रेष्ठता तब धूल चाटने लगी। तब आपमें से अधिकांश अवसरवादी लोग मुगलों और अंग्रेजों की चाटुकारिता में लग गए और जब आजादी मिलने का समय आया तो चूहे की तरह कूदकर सत्ता और सरकार में शामिल हो गए। भारत का स्वतंत्रता संघर्ष तो मुख्य रूप से पिछड़े और दलित वर्ग के लोगों ने लड़ा, लेकिन उसके नेतृत्व पर सवर्ण वर्ग के नेताओं ने अपना वर्चस्व कायम कर लिया।
सर्वोदय और आरक्षण आजादी मिलने के बाद पहली बार भारतीय संविधान में ‘सर्वोत्तम की उत्तरजीविता’ के स्थान पर सर्वोदय के सिद्धांत को कार्यान्वित किया गया, हालाँकि बात हमारे यहाँ सदियों से ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ की होती रही है। भारतीय लोकतंत्र का आदर्श स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व पर आधारित सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना है। लोकतांत्रिक भारत में इस आधार पर किसी को प्रतिष्ठा और अवसर की समानता से वंचित नहीं किया जा सकता कि वह आपसे कम योग्य है। यदि कोई फिलहाल आपसे कम योग्य है तो उसकी संभावना का विकास कीजिए और उसे अपने बराबर की प्रतिष्ठा और अवसर दीजिए ताकि वह आपसे स्वस्थ प्रतियोगिता कर सकने में सक्षम बन सके। “प्रत्येक जीव अव्यक्त ब्रह्म है।” हर मानव में विकास करने की असीम संभावना छिपी होती है, उस संभावना का पता लगाइए और उसका विकास करने का अवसर और माहौल दीजिए। भारतीय संविधान में दलित और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान इसीलिए किया गया है। जब पिछड़े वर्गों को सरकारी सेवाओं में आरक्षण दिया जाने लगा तो आपने कहा कि नौकरी में आरक्षण मत दो, उन्हें पढ़ाई-लिखाई की सुविधा दो ताकि पहले वे योग्य हो जाएँ, उसके बाद रोजगार प्राप्त करें। अब जब पढ़ाई-लिखाई के मामले में आरक्षण दिए जाने की बात उठी तो आप कहते हैं कि यह गलत हो रहा है, योग्यता का गला घोंटा जा रहा है और शिक्षा का स्तर बिगाड़ा जा रहा है। अब आप उच्च शिक्षा में आरक्षण का विरोध कर रहे हैं। संविधान लागू होने के बाद 40 वर्ष तक आपलोगों ने ऐसा कुछ क्यों नहीं किया ताकि पिछड़े वर्गों को आरक्षण की जरूरत नहीं पड़ती। जब संविधान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के साथ-साथ सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े अन्य वर्गों को भी आगे लाने के लिए विशेष उपाय किए जाने की बात कही गई तो उनपर अमल क्यों नहीं किया गया। सच बात यह थी कि आपकी नीयत नहीं थी उन्हें बराबरी का हक़ देने की। जब उनमें राजनीतिक और सामाजिक चेतना का विकास हुआ तो वे लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीकों से अपना हक़ हासिल करने की चेष्टा में लगे हैं।
सामाजिक न्याय और राजनीतिक मजबूरी यह ठीक है कि 1990 में मंडल आयोग की कुछ सिफारिशों को लागू करके कुछ राजनेताओं ने अपनी राजनीति खूब चमकाई। उसी के बाद सामाजिक न्याय का मुद्दा हर राजनीतिक दल की ज़बान पर चढ़ा। पिछड़े वर्गों का पहली बार ऐसा ध्रुवीकरण हुआ कि वह दलित वर्ग से भी बड़ा वोट बैंक बनकर उभरा जिसको अपने पाले में करना सत्ता हासिल करने की ख्वाहिश रखने वाले हर राजनीतिक दल की मजबूरी हो गई। हालाँकि दोनों बड़े राजनीतिक दल -- कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी सामाजिक न्याय की राजनीति को आत्मसात नहीं कर पाए। लेकिन पिछड़े डेढ़ दशक में इन दोनों राजनीतिक दलों को भलीभाँति अनुभव हो गया कि सामाजिक न्याय के मुद्दे को छोड़कर भारतीय राजनीति में सत्ता हासिल कर पाना संभव नहीं है। भारतीय जनता पार्टी ने मंडल की काट के लिए कमंडल के अस्त्र को आजमाया, लेकिन वह अधिक दिनों तक कारगर साबित नहीं हो पाया। कांग्रेस पार्टी ने आर्थिक ‘सुधारों’ और निजीकरण के द्वारा भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा के जरिए विकास के सिद्धांत को स्थापित करने की रणनीति अपनाई। लेकिन उसे मालूम है कि इससे चुनाव जीते नहीं जा सकते, इसलिए उसे भी मजबूर होकर शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण और निजी क्षेत्रों में आरक्षण के मुद्दे को अपनाना पड़ा। वामपंथी पार्टियाँ आर्थिक न्याय की राजनीति पर जोर दिए जाने की वकालत करती रही, लेकिन सत्ता से जुड़े रहने के बावजूद ठोस धरातल पर वे इस दिशा में कुछ भी कारगर प्रयास नहीं कर सकीं। जो चरमपंथी वामपंथी पार्टियाँ थी उनलोगों ने नक्सलवाद के रूप में आर्थिक न्याय को हासिल करने के लिए एक ऐसी राह पकड़ ली, जो लोकतंत्र और संविधान के ही विपरीत दिशा में काम करता है।
स्थायी समाधान आरक्षण का स्थायी विकल्प यही हो सकता है कि आप सबके लिए पर्याप्त अवसर पैदा कर दें ताकि किसी को आरक्षण देने की नौबत ही नहीं आए। दूसरा समाधान यह कि व्यक्ति अपनी योग्यता और अभिरुचि के अनुसार चाहे जो भी वैध रोजगार करे और उसकी आमदनी चाहे जितनी कम हो, उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा और जीवन के लिए उपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित की जाए। प्रकृति ने मनुष्यों में प्रतिभा, क्षमता और अभिरुचि की विविधता प्रदान की है, लेकिन मनुष्यों ने उस विविधता को पदानुक्रम का पैमाना बना लिया है। जब तक पदानुक्रम की मानसिकता समाप्त नहीं होती, तब तक आरक्षण का प्रावधान भी जारी रहेगा।
Friday, April 14, 2006
प्रायोजित आरक्षण-विरोध का पर्दाफाश
Tuesday, April 11, 2006
आरक्षण पर शरद यादव की राय
विश्वनाथ प्रताप सिंह की राय
Sunday, April 09, 2006
पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण पर बहस
Saturday, April 08, 2006
नसीहतें
कोई आदमी इतना बुरा नहीं होता कि
अपनी गलती का अहसास कभी कर न सके।
वहम का कोई जाल इतना सघन नहीं होता कि
उसको काटकर ग़लतफ़हमी दूर न की जा सके।’
कोई जख्म इतना गहरा नहीं होता कि
वक्त के साथ भर न जाए।
कोई फासला इतना बड़ा नहीं होता कि
उसको तय कर करीब न आया जा सके।
कोई मुश्किल ऐसी नहीं होती कि
कोशिशों से आसान न बन जाए।
कोई मंजिल इतनी दूर नहीं होती कि
चलते-चलते एक दिन करीब न आ जाए।
कोई चीज ऐसी नहीं खुदा की कायनात में कि
जिसका कोई खूबसूरत इस्तेमाल हो न सके।
कोई विफलता इतनी बड़ी नहीं होती कि
नए सिरे से कोशिश शुरू न की जा सके।
कभी भी इतनी देर नहीं होती कि
सही राह पर आना मुमकिन न रहे।
ऐसी नौबत कभी नहीं आती कि
आगे कोई उम्मीद बाकी न रहे।