Wednesday, July 26, 2006

सृजन शिल्पी का स्थायी पता

मित्रो, सृजन शिल्पी का पता स्थायी रूप से बदल गया है। इस बदलाव के लिए ब्लॉगस्पॉट पर अल्पकालीन सरकारी प्रतिबंध निमित्त बना। लेकिन जैसी कि कहावत है, बदलाव अक्सर बेहतरी के लिए होता है। तो आइए न....... अब वहीं मिलते हैं, मेरे स्थायी पते पर

Monday, July 24, 2006

चिट्ठाकारिता और उसकी प्रकृति

चिट्ठाकारी (ब्लॉगिंग) को आम तौर पर अनौपचारिक लेखन ही माना जाता है। अनौपचारिकता शायद इसकी प्रकृति में ही है। जैसा कि मार्शल मैक्लुहान ने कहा है, “माध्यम ही संदेश है”, हर माध्यम अपने द्वारा प्रसारित संदेश और पाठक, श्रोता अथवा दर्शक पर होने वाले उसके असर को एक विशिष्ट प्रकार से अनुकूलित करता है। ब्लॉग वेब पर प्रकाशन का एक ऐसा माध्यम है, जो लेखन को पाठक तक पहुंचाने और लेखक तथा पाठक के बीच परस्पर संवाद के लिए एक सहज, तत्क्षण और अनौपचारिक विकल्प प्रदान करता है। लेखन के इतिहास में ब्लॉग शायद पहला ऐसा माध्यम है जिसमें लेखक और पाठक के बीच में कोई मध्यस्थ नहीं है। यह लेखक और पाठक, दोनों के लिए सुकूनदायक है। किसी मध्यस्थ के माध्यम से अभीष्ट तक पहुँचना कितना पीड़ादायी है, इसे धूमिल ने अपनी प्रसिद्ध कविता में कुछ इस तरह से व्यक्त किया है:

एक आदमी रोटी बेलता है

एक आदमी रोटी खाता है

एक तीसरा आदमी भी है

जो न रोटी बेलता है

न रोटी खाता है

वह सिर्फ रोटी से खेलता है

मैं पूछता हूँ कि

यह तीसरा आदमी कौन है

मेरे देश की संसद मौन है।

पारंपरिक लेखन में लेखक और पाठक के बीच प्रकाशक, विक्रेता और समीक्षक आते हैं। प्रकाशक और विक्रेता जहाँ लेखन से होने वाले मुनाफ़े को हड़पने के कारोबार में माहिर होते हैं, वहीं समीक्षक लेखन के मानक और लेखक के स्तर को कृत्रिम ढंग से निर्धारित करने के खेल के उस्ताद। यहाँ तक कि अंतर्जाल (इंटरनेट) आने के बाद जब वेबसाइटों के माध्यम से लेखक और पाठक के बीच की दूरी को मिटाने की क्रांतिकारी कोशिश शुरू हुई तब भी वेब प्रकाशन की तकनीकी जटिलता के कारण वेब डिजाइनरों और वेब डेवलपरों की सेवाओं का सहारा लेना आवश्यक ही रहा। वर्ष 1997 में ब्लॉग के आने के बाद से लेखक और पाठक के बीच मध्यस्थ की भूमिका लुप्त हो गई। मुनाफ़ा और मानक का तत्व हट जाने, लेखन का सहज रूप से तत्क्षण प्रकाशित हो जाने की सुविधा मिल जाने और पाठक के बीच पैठ बना सकने के लिए पेशेवर विशेषज्ञता आवश्यक नहीं रह जाने के कारण पारंपरिक लेखन की गंभीरता और औपचारिकता से अलग ब्लॉग लेखन की एक नई शैली के विकास का माध्यम बना, जिसकी प्रकृति अनौपचारिक, सामूहिक, परस्पर संवादी और लोकतांत्रिक है। …… (क्रमश:)

Friday, June 23, 2006

क्या करें ?

कुछ वर्ष पहले मैंने क्या करें (What to do) नामक एक उपन्यास पढ़ा था, जिसके लेखक मशहूर रूसी लेखक निकोलाई चेर्नीशेव्स्की हैं। यह दुनिया की कुछ चुनिंदा किताबों में से है। यह लेनिन और महात्मा गाँधी की सबसे प्रिय किताबों में से थी। इस उपन्यास में रहमेतोव, लोपुखोव और किरतानेव जैसे उदात्त नायकों की परिकल्पना की गई है जो नए और परिष्कृत मानव के आदर्श को निरूपित करते हैं। इसका महत्व इस दृष्टि से अधिक है कि बीसवीं सदी में कई ऐसे महापुरुष वास्तव में हुए जो उन्नीसवीं सदी में चेर्नीशेव्स्की द्वारा की गई परिकल्पना से भी कहीं अधिक महान साबित हुए। मेरा अपना विश्वास है कि इक्कीसवीं सदी में भी कुछ ऐसे महामानव अवश्य उभर सकेंगे जो अब तक के इतिहास में दर्ज महामानवों से भी कहीं अधिक महान सिद्ध होंगे।

उक्त उपन्यास की भूमिका में बताया गया है, “जीवन की सच्चाई को चेर्नीशेव्स्की साहित्यिक रचना की मूल कसौटी मानते थे और उनका यह उपन्यास इस कसौटी पर खरा उतरता है। इस उपन्यास का सर्वोपरि लक्ष्य लोगों के लिए सच्चे अर्थों में सच्ची मानवीय नैतिकता और सच्चे अर्थों में आध्यात्मिकता से समृद्ध जीवन का प्रचार करना है। यह राजनीतिक, सामाजिक और दार्शनिक उपन्यास...वास्तव में प्रेम की पुस्तक है। प्यार-मुहब्बत का उपन्यास नहीं, बल्कि सच्चे अर्थों में प्रेम की पुस्तक जो यह बताती है कि असली, सच्चा प्यार क्या होता है और लोगों को मानव की तरह जीने और प्रेम करने के लिए किस चीज की जरूरत है। यह पुस्तक मनोरंजन और मनबहलाव के लिए नहीं है। यह परिपक्व और चिंतनशील पाठक के लिए है।” लेनिन ने इस उपन्यास के संबंध में लिखा है, "चेर्नीशेव्स्की का यह उपन्यास इतना जटिल और गहन है कि उसे अल्पायु में समझना असंभव है। मैंने खुद, जहाँ तक याद है, 14 वर्ष की आयु में उसे पढ़ने की कोशिश की थी। तब यह व्यर्थ, सतही पठन था। पर बड़े भाई को मृत्युदंड दिए जाने के बाद मैंने उसे फिर से ध्यान से पढ़ने का फैसला किया क्योंकि मुझे मालूम था कि क्या करें उपन्यास मेरे भाई की प्रिय पुस्तक था। और तब मैं उसे कई दिन नहीं, कई सप्ताह तक पढ़ता रहा। तभी मैं उसकी गहराई को समझा। यह एक ऐसी पुस्तक है जो आजीवन उत्साह प्रदान करती है।" चेर्नीशेव्स्की ने स्वयं अपने लेखन के बारे में लिखा है, “मुझमें रत्ती भर साहित्यिक प्रतिभा नहीं है। मेरी रूसी भी बहुत बुरी है। कोई बात नहीं—पढ़ते जाइए, भले लोगों, आप देखेंगे कि आपका समय व्यर्थ ही नष्ट नहीं हुआ। सत्य अत्यंत गौरवशाली ध्येय है, और जो लेखक इस ध्येय की सेवा करता है उसके सारे दोषों का विमोचन हो जाता है।...मेरी कहानी में जो भी गुण हैं उनमें से एक-एक सत्य और केवल सत्य की बदौलत है।” प्रस्तुत है इस उपन्यास से कुछ महत्वपूर्ण पंक्तियाँ जो मैंने उपन्यास पढ़ते समय अपनी डायरी में लिख ली थीं:

  • मानव के लिए अपने कृत्य की सच्चाई, विवेकपूर्णता और नैतिकता की अनुभूति से अधिक बड़ा नैतिक लाभ नहीं होता है।
  • अच्छी जिंदगी केवल कमीनों के लिए होती है, उनके लिए नहीं जो ईमानदार हैं।
  • प्रेम के बिना एक भी चुम्बन मत देना किसी को, भले ही तुम्हें मर ही जाना क्यों न पड़े!
  • कोई भी मनुष्य अपने अस्तित्व को कुंठित किए बिना अकेला नहीं रह सकता। या तो निर्जीव बन जाओ अथवा नीचता से समझौता कर लो।
  • आप जिस व्यक्ति से प्रेम करती हैं, उसे ऐसा कोई काम अपने लिए करने की अनुमति नहीं देंगी, जिसे वह संभवतया अरुचिकर माने, वह आपके लिए तनिक-सा भी त्याग करे अथवा जरा-सी भी रियायत दे, उससे पहले आप मर जाना पसंद करेंगी। यही भाषा है अनुराग की, यही है प्रेम। यदि कोई अनुराग कुछ और बतलाता है तो यह निपट वासना है, जिसका प्रेम से कोई वास्ता नहीं।
  • जरा से भी तर्क अनुभव से संपन्न किसी निष्कपट साधारण व्यक्ति को धोखा देना बहुत कठिन काम है।
  • माल संभालकर रखो, चोर को बेकार ललचाओ मत।
  • सिद्धांत चाहे जितना भी नीरस क्यों न हो यह जीवन के सबसे सच्चे मूल-स्रोत से उसका साक्षात्कार कराता है और काव्य का निवास तो सचाई में ही होता है।
  • कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होता, जिसके चरित्र में ऐसा कुछ न हो जो निष्कलंक है।

Wednesday, June 21, 2006

अर्धनारीश्वर और वाणभट्ट की आत्मकथा

इटली निवासी चिट्ठाकार मित्र सुनील जी ने अपने चिट्ठे पर प्रकाशित लेख मैं शिव हूँ में मेरी एक टिप्पणी का उल्लेख करते हुए मुझसे हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास वाणभट्ट की आत्मकथा के आधार पर किसी व्यक्ति में पुरुष और स्त्री के द्वंद्व का भारतीय दर्शन के दृष्टिकोण से विश्लेषण करने का अनुरोध किया है। उनके अनुरोध को ध्यान में रखते हुए उक्त उपन्यास को मैंने एक बार फिर से पढ़ा। उपन्यास में वर्णित दर्शन की व्याख्या से पहले इस उपन्यास के प्रासंगिक अंशों को उद्धृत कर देना मैं अधिक उपयुक्त समझता हूँ। उपन्यास के इन अंशों में आए संवाद इतने जीवंत और मर्मभेदी हैं कि वे पाठकों के समक्ष अपने आशय को स्वत: स्पष्ट कर देते हैं। फिर भी, यदि सुनील जी एवं अन्य पाठक चाहेंगे तो अगली प्रविष्टि में इसके दर्शन की व्याख्या करने का प्रयास करूँगा।

[1]

एक बात पूछूँ, माता?”

पूछो।

बाबा ने कल मुझसे जो कुछ कहा, उसका क्या अभिप्राय है?”

बाबा से अधिक मैं क्या बता सकती हूँ।

प्रवृत्तियों की पूजा करने का क्या तात्पर्य हो सकता है?”

बाबा ने क्या कहा है?”

बाबा ने कहा है कि प्रवृत्तियों से डरना भी गलत है, उन्हें छिपाना भी ठीक नहीं और उनसे लज्जित होना बालिशता है। फिर उन्होंने कहा है कि त्रिभुवन-मोहिनी ने जिस रूप में तुझे मोह लिया है, उसी रूप की पूजा कर, वही तेरा देवता है। फिर विरतिवज्र से उन्होंने कहाइस मार्ग में शक्ति के बिना साधना नहीं चल सकती। ऐसी बहुत-सी बातें उन्होंने बताईं जो अश्रुतपूर्व थीं। क्यों अंब, शक्ति क्या स्त्री को कहते हैं? और स्त्री में क्या सचमुच त्रिभुवन-मोहिनी का वास होता है?”

देख बाबा, तू व्यर्थ की बहस करने जा रहा है। बाबा ने जो कुछ कहा है वह पुरुष का सत्य है। स्त्री का सत्य ठीक वैसा ही नहीं है।

उसका विरोधी है, मात:?”

पूरक है रे! पूरक अविरोधी हुआ करता है!”

मैं समझ नहीं सका।

समझ जाएगा, तेरे गुरु प्रसन्न हैं, तेरी कुंडलिनी जाग्रत है, तुझे कौल-अवधूत का प्रसाद प्राप्त है, उतावला न हो। इतना याद रख कि पुरुष वस्तु-विच्छिन्न भावरूप सत्य में आनंद का साक्षात्कार करता है, स्त्री वस्तु-परिगृहीत रूप में रस पाती है। पुरुष नि:संग है, स्त्री आसक्त; पुरुष निर्द्वंद्व है, स्त्री द्वंद्वोन्मुखी; पुरुष मुक्त है, स्त्री बद्ध। पुरुष स्त्री को शक्ति समझकर ही पूर्ण हो सकता है; पर स्त्री, स्त्री को शक्ति समझकर अधूरी रह जाती है।

तो स्त्री की पूर्णता के लिए पुरुष को शक्तिमान मानने की आवश्यकता है न, अंब?”

ना। उससे स्त्री अपना कोई उपकार नहीं कर सकती, पुरुष का अपकार कर सकती है। स्त्री प्रकृति है। वत्स, उसकी सफलता पुरुष को बाँधने में है, किंतु सार्थकता पुरुष की मुक्ति में है। मैं कुछ भी नहीं समझ सका। केवल आँखें फाड़-फाड़कर महामाया की ओर देखता रहा। वे समझ गईं कि मैंने कहीं मूल में ही प्रमाद किया है। बोलीं, नहीं समझ सका न? मूल में ही प्रमाद कर रहा है, भोले! तू क्या अपने को पुरुष समझ रहा है और मुझे स्त्री? यही प्रमाद है। मुझमें पुरुष की अपेक्षा प्रकृति की अभिव्यक्ति की मात्रा अधिक है, इसलिए मैं स्त्री हूँ। तुझमें प्रकृति की अपेक्षा पुरुष की अभिव्यक्ति अधिक है, इसलिए तू पुरुष है। यह लोक की प्रज्ञप्तिप्रज्ञा है, वास्तव सत्य नहीं। ऐसी स्त्री प्रकृति नहीं है, प्रकृति का अपेक्षाकृत निकटस्थ प्रतिनिधि है और ऐसा पुरुष प्रकृति का दूरस्थ प्रतिनिधि है। यद्यपि तुझमें तेरे ही भीतर के प्रकृति-तत्व की अपेक्षा पुरुष-तत्व अधिक है; पर वह पुरुष-तत्व मेरे भीतर के पुरुष-तत्व की अपेक्षा अधिक नहीं है। मैं तुझसे अधिक नि:संग, अधिक निर्द्वंद्व और अधिक मुक्त हूँ। मैं अपने भीतर की अधिक मात्रावाली प्रकृति को अपने ही भीतरवाले पुरुष-तत्व से अभिभूत नहीं कर सकती। इसलिए मुझे अघोरभैरव की आवश्यकता है। जो कोई भी पुरुष प्रज्ञप्तिवाला मनुष्य मेरे विकास का साधन नहीं हो सकता।

और अघोरभैरव को आपकी क्या आवश्यकता है?”

मुझे मेरी ही अंत:स्थिता प्रकृति रूप में सार्थकता देना। वे गुरु हैं, वे महान हैं, वे मुक्त हैं, वे सिद्ध हैं। उनकी बात अलग है।

(षष्ठ उच्छ्वास से)

[2]

महामाया ने ही फिर शुरू किया—“तो तू मेरी बात नहीं मानती। हाँ बेटी, नारीहीन तपस्या संसार की भद्दी भूल है। यह धर्म-कर्म का विशाल आयोजन, सैन्य-संगठन और राज्य-व्यवस्थापन सब फेन-बुदबुद की भाँति विलुप्त हो जाएँगे; क्योंकि नारी का इसमें सहयोग नहीं है। यह सारा ठाठ-बाट संसार में केवल अशांति पैदा करेगा।

भट्टिनी ने चकित की भाँति प्रश्न किया—“तो माता, क्या स्त्रियाँ सेना में भरती होने लगें, या राजगद्दी पाने लगें, तो यह अशांति दूर हो जाएगी?”

महामाया हँसी। बोलीं, सरला है तू, मैं दूसरी बात कह रही थी। मैं पिंडनारी को कोई महत्वपूर्ण वस्तु नहीं मानती। तुम्हारे इस भट्ट ने भी मुझसे पहली बार इसी प्रकार प्रश्न किया था। मैं नारी-तत्व की बात कह रही हूँ रे! सेना में अगर पिंड-नारियों का दल भरती हो भी जाए तो भी जब तक उसमें नारी-तत्व की प्रधानता नहीं होती, तब तक अशांति बनी रहेगी।

मेरी आँखें बंद थीं, खोलने का साहस मुझमें नहीं था। परंतु मैं कल्पना के नेत्रों से देख रहा था कि भट्टिनी के विशाल नयन आश्चर्य से आकर्ण विस्फारित हो गए हैं। ज़रा आगे झुककर उन्होंने कहा, मैं नहीं समझी।

महामाया ने दीर्घ नि:श्वास लिया। फिर थोड़ा सम्हलकर बोलीं, परम शिव से दो तत्व एक ही साथ प्रकट हुए थेशिव और शक्ति। शिव विधिरूप हैं और शक्ति निषेधरूपा। इन्हीं दो तत्वों के प्रस्पंद-विस्पंद से यह संसार आभासित हो रहा है। पिंड में शिव का प्राधान्य ही पुरुष है और शक्ति का प्राधान्य नारी है। तू क्या इस मांस-पिंड को स्त्री या पुरुष समझती है? ना सरले, यह जड़ मांस-पिंड न नारी है, न पुरुष! वह निषेधरूप तत्व ही नारी है। निषेधरूप तत्व, याद रख। जहाँ कहीं अपने-आपको उत्सर्ग करने की, अपने-आपको खपा देने की भावना प्रधान है, वहीं नारी है। जहाँ कहीं दु:ख-सुख की लाख-लाख धाराओं में अपने को दलित द्राक्षा के समान निचोड़कर दूसरे को तृप्त करने की भावना प्रबल है, वहीं नारी-तत्व है, या शास्त्रीय भाषा में कहना हो, तो शक्ति-तत्व है। हाँ रे, नारी निषेधरूपा है। वह आनंद-भोग के लिए नहीं आती, आनंद लुटाने के लिए आती है। आज के धर्म-कर्म के आयोजन, सैन्य-संगठन और राज्य-विस्तार विधि-रूप हैं। उनमें अपने-आपको दूसरों के लिए गला देने की भावना नहीं है, इसीलिए वे एक कटाक्ष पर ढह जाते हैं, एक स्मित पर बिक जाते हैं। वे फेन-बुदबुद की भाँति अनित्य हैं। वे सैकतसेतु की भाँति अस्थिर हैं। वे जल-रेखा की भाँति नश्वर हैं। उनमें अपने-आपको दूसरों के लिए मिटा देने की भावना जब तक नहीं आती, तब तक वे ऐसे ही रहेंगे। उन्हें जब तक पूजाहीन दिवस और सेवाहीन रात्रियाँ अनुतप्त नहीं करतीं और जब तक अर्ध्यदान उन्हें कुरेद नहीं जाता, तब तक उनमें निषेधरूपा नारी तत्व का अभाव रहेगा और तब तक वे केवल दूसरों को दु:ख दे सकते हैं।

(एकादश उच्छ्वास से)

Friday, June 16, 2006

मेरा जन्म दिन और मूल नक्षत्र

आज, 16 जून को मेरा जन्म दिन है। यही मेरी वास्तविक जन्म तिथि है, हालाँकि आधिकारिक प्रयोजनों के लिए मेरी जन्म तिथि 3 जनवरी है। जे.एन.यू. में अपने अध्ययन काल में और उसके कुछ वर्षों बाद तक मैं 3 जनवरी को ही अपना जन्म दिन मनाया करता था जिसमें मेरे बहुत से घनिष्ठ मित्र शामिल होते थे। मेरी मित्र-मंडली में दिल्ली के विभिन्न न्यूज चैनलों एवं समाचार पत्रों में कार्यरत युवा पत्रकार और दिल्ली के विभिन्न शिक्षण संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे युवा लेक्चरर तथा भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में कार्यरत युवा अधिकारी शामिल हैं। इनमें से कई साथी 3 जनवरी को मेरे जन्म दिन पर अपने पेशे की तमाम व्यस्तताओं के बावजूद पार्टी में शामिल होने का समय निकाल लेते थे। लेकिन अब 3 जनवरी को घर पर जन्म-दिन की पार्टी रखने का वह सिलसिला भंग हो गया है।

मुझे अपनी वास्तविक जन्म-तिथि पहले ज्ञात नहीं थी। हाई स्कूल के सर्टिफ़िकेट में उल्लिखित जन्म-तिथि को ही मैं अपना जन्म-दिन मनाकर खुश हो लिया करता था। लेकिन दो वर्ष पहले जब विवाह के लिए पारिवारिक दबाव और रिश्तों के प्रस्तावों को टालना मेरे लिए मुश्किल हो गया तो मैंने अपनी जन्म-कुंडली बनाने की सोची। लेकिन प्रामाणिक जन्म-कुंडली के लिए जन्म की तारीख और समय का ज्ञान होना बहुत जरूरी है। जब मैंने जन्म से संबंधित विवरणों के बारे में अपने माँ-पिताजी से पूछा तो वे भी सटीक रूप से इसे याद नहीं कर पाए। पिताजी ने शायद इसे कहीं डायरी में लिख कर रखा था, लेकिन खोजने पर 1973 की वह डायरी नहीं मिल पाई। शायद वह मेरे गाँव में प्राय: हर वर्ष आने वाली बाढ़ की भेंट चढ़ गई होगी। इसलिए मेरे लिए अपना जन्म-दिन एक पहेली बन गया था, जिसे मैंने बहुत खोजबीन और ज्योतिषीय गणनाओं के बाद अब सुलझा लिया है। इसके लिए मुझे कुछ नामचीन ज्योतिषियों की भी मदद लेनी पड़ी।

16 जून की तारीख मूल नक्षत्र में पड़ती है, जिसमें जन्म लेने वाले लोग जन्म से दुर्भाग्यशाली लेकिन कर्म से दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने वाले माने जाते हैं। तुलसीदास का उदाहरण विश्वविख्यात है। ऐसी मान्यता है कि मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले अधिकांश जातक अपने परिवार के लिए शोक का कारण बनते हैं। मूल नक्षत्र के चार भागों में से पहले तीन भाग अशुभ माने जाते हैं। इस नक्षत्र के पहले भाग में जन्म लेने वाला जातक पिता के शोक अथवा मृत्यु का कारण बनता है, दूसरे भाग में जन्म लेने वाला जातक अपनी माता के शोक अथवा मृत्यु का कारण बनता है, जबकि तीसरे भाग में जन्म लेने वाला जातक पारिवारिक संपत्ति की गंभीर हानि का कारक होता है। मेरी नानी का देहांत मेरी छठी का संस्कार समाप्त होने के तुरंत बाद अचानक हो गया था। इसके आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि मेरा जन्म संभवत: मूल नक्षत्र के दूसरे भाग में हुआ होगा। मूल नक्षत्र के जातक को विरासत में कोई पैतृक संपत्ति प्राप्त नहीं होती। मूल नक्षत्र के जातकों की अन्य विशेषताओं के बारे में पढ़ने के बाद अपने जन्म-दिन के बारे में मेरी यह धारणा पुष्ट होती गई।

मूल नक्षत्र के जातक एक साथ कई क्षेत्रों में दिलचस्पी रखते हैं और उनमें विशेषज्ञता भी हासिल करते हैं और इसीलिए वे अपने कैरियर का क्षेत्र भी बारंबार बदलते रहते हैं। मेरे साथ तो यह प्रत्यक्ष ही हुआ है। पहले अध्यात्म, उसके बाद पत्रकारिता, फिर कार्यपालिका, उसके बाद विधायिका और अब न्यायपालिका के क्षेत्र में मेरी सक्रियता शायद मूल नक्षत्र में जन्म लेने के प्रभावस्वरूप ही बार-बार बदलती रही है। पिछले चार वर्ष में अपना कार्यस्थल मैं चार बार बदल चुका हूँ। बारंबार कार्यक्षेत्र बदलने के अपने नुकसान हैं जो मैं झेल रहा हूँ। मूल नक्षत्र के जातकों की एक बहुत बड़ी खामी यह है कि वे जिन बातों का उपदेश दूसरों को बहुत बेहतर ढंग से दे सकते हैं उनका पालन स्वयं अपने जीवन में कर पाना उनके लिए दुष्कर होता है। इसीलिए उन्हें सलाहकार की भूमिका के लिए अत्यंत उपयुक्त माना गया है। वैसे मूल नक्षत्र के अधिकतर जातक वक्ता, लेखक, दार्शनिक, आध्यात्मिक गुरु, वकील, राजनीतिज्ञ और डॉक्टर के रूप में अधिक सफल रहते हैं। जब मैं आत्मान्वेषण करता हूँ तो मुझे अपने अंदर इन सभी विशेषज्ञताओं के बीजांकुर मिलते हैं।

मैं सोचता हूँ कि ब्लॉग के माध्यम से मुझे अपने भीतर के उन बीजांकुरों को पल्लवित करने का मौका मिलेगा और शायद इसी तरह से मैं अपने जन्मजात दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित कर पाऊँगा। मानसी जी ज्योतिष शास्त्र की विशेषज्ञ हैं, शायद वह कुछ बेहतर प्रकाश डाल सकें। बहरहाल आप मुझे आज जन्म-दिन की बधाई दे सकते हैं, जिसकी शुरुआत इंडिया टी.वी. के पत्रकार और हिन्दी ब्लॉग जगत के सक्रिय साथी नीरज दीवान ने आज पहली बार अकस्मात सुबह-सुबह फोन पर बधाई देकर कर दी है। शायद यह टेलीपैथी का ही कमाल होगा, जिसके चमत्कारों में मेरा गहरा विश्वास है। उन्हें तो पहले से पता भी नहीं था मेरे जन्म दिन का। लेकिन जब मैं आज सुबह-सुबह यह पोस्ट लिख रहा था तो अनायास ही उनका फोन आ गया और उन्होंने बताया कि अभी-अभी जगा हूँ और आपकी याद आने लगी तो मैंने फोन कर दिया।

Tuesday, May 30, 2006

आरक्षण : विरोध के बावजूद

तमाम विरोध प्रदर्शनों और मीडिया द्वारा उसे लगभग एकतरफा एवं पक्षपातपूर्ण ढंग से तूल दिए जाने के बावजूद केन्द्र सरकार ने अगले शैक्षिक सत्र से पिछड़ी जातियों के लिए 27% आरक्षण के प्रावधान को लागू करने का निर्णय कर ही लिया। संवैधानिक प्रतिबद्धताओं को पूरा करने और न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सत्ताधारी गठबंधन के बीच आम सहमति को अमल में लाने के लिए सरकार के पास इसके सिवाय कोई अन्य विकल्प नहीं था। बेहतर होता कि आरक्षण के प्रावधान को वास्तविक रूप से लागू किए जाने से पहले अर्जुन सिंह इसके संबंध में कोई बयान देने से बचते। यह स्वाभाविक है कि आरक्षण के प्रावधान के लागू होने से जिन लोगों के हितों को नुकसान पहुँचेगा वे इसका विरोध करेंगे। लोकतंत्र में उन्हें भी अपनी बात शांतिपूर्वक व्यक्त करने का अधिकार है। लेकिन आरक्षण के विरोध और फिर उसकी प्रतिक्रिया में आरक्षण के समर्थन ने कहीं-कहीं उग्र स्वरूप भी अख्तियार कर लिया और दोनों पक्ष के छात्र-छात्राओं को पुलिस के डंडों का कोपभाजन भी बनना पड़ा। इस मुद्दे पर हमारी युवा पीढ़ी के मानस में हिंसा और तनाव का माहौल पैदा होना निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन उससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण है आरक्षण का विरोध करने वालों द्वारा सामाजिक वास्तविकता को समझने की कोशिश नहीं करना और संविधान की मर्यादा का सम्मान नहीं करना। सरकार के निर्णय के विरोध में आरक्षण-विरोधियों द्वारा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री महोदय की अपीलों को अनसुना करते हुए अपने आंदोलन को पहले से भी अधिक उग्रता से जारी रखने के फैसले को देखते हुए भारतीय जनमानस में उत्तेजना और अशांति फैलने की आशंका बढ़ गई है। मेरी नजर में इसके लिए सबसे अधिक दोषी है प्रेस और मीडिया, जिसने अपना फ़र्ज़ ईमानदारी और निष्पक्षता से अंजाम नहीं दिया। उसे इस मुद्दे पर दोनों विपरीत पक्षों के बीच सार्थक बौद्धिक बहस का माहौल बनाने की कोशिश करनी चाहिए थी ताकि दोनों पक्ष एक-दूसरे के विचारों, तर्कों और भावनाओं को समझ सकें और उनके बीच परस्पर सहमति एवं सदभाव का माहौल विकसित हो सके। लेकिन समाचार पत्रों और मीडिया संस्थानों में काम करने वाले अधिकांश पत्रकारों ने इस मामले में अपने जातीय दुराग्रह से प्रेरित होकर आहत स्वार्थ की प्रतिक्रिया में इस मामले पर केवल आरक्षण विरोध को सही ठहराने और एक तरह से उसे प्रायोजित भी करने की हर संभव कोशिश की। कहते हैं कि "मँझधार में जब नैया डोले तो माँझी उसे बचाए लेकिन जब माँझी ही नैया डुबोए तो उसे कौन बचाए ?" योग्यता की हत्या का बेवजह हौवा खड़ा किया गया, ओ.बी.सी. की आबादी के मनगढ़ंत आँकड़े ढूँढ़ निकाले गए और आरक्षण के प्रावधान के संवैधानिक महत्व को स्खलित करने के लिए तमाम थोथे तर्क दिए जाते रहे और आरक्षण को टालने के लिए तमाम फिजूल उपाय सुझाये जाते रहे। मीडिया के कैमरे का फोकस 'योग्यता' के मुखर स्वरों पर केन्द्रित रहा जो तरह-तरह के प्रदर्शनों के आयोजन से उनके लिए मसालेदार ख़बरों का तैयार माल उपलब्ध कराता रहा। प्रेस और मीडिया में सवर्ण लोगों का वर्चस्व भारतीय जनमानस और जनमत के लिए कितना असंतुलनकारी हो सकता है यह आरक्षण के मुद्दे पर जाहिर हो गया। यह स्थिति इस क़दर विस्फोटक हुई कि पटना में आरक्षण के समर्थक डॉक्टरों और छात्रों ने मीडिया को कसूरवार मानते हुए उसे अपने आक्रोश का शिकार बना डाला। प्रेस और मीडिया के इस अविवेक पर अंकुश लगाने के लिए कुछ विवेकशील पत्रकारों ने हस्तक्षेप करने की कोशिश की। कई पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने मुद्दे के दूसरे पहलू से भी जनमानस को अवगत कराने की चेष्टा की। देर से ही सही, मीडिया में विवेक का कहीं-कहीं संचार हुआ भी। कंज्यूमर चैनल आवाज़ पर संजय पुगलिया ने योजना आयोग के सदस्य, डॉ. भालचन्द मुंगेकर से आरक्षण के मुद्दे पर लंबी बातचीत करके दूसरे पक्ष को अपनी बात रखने का अवसर दिया। हालाँकि इसी चैनल पर शिशिर सिन्हा एक परिचर्चा को प्रायोजित करके आरक्षण के विरोध को एकतरफा ढंग से सही ठहराने की 'बेशर्मी' दिखा चुके थे। विचार चैनल 'जनमत' पर अल्का सक्सेना ने भी एक परिचर्चा में कुछ इसी तरह की 'बेवकूफी' की थी। हालाँकि इस चैनल ने एक अन्य कार्यक्रम में उदित राज को भी आमंत्रित किया था, लेकिन उन्हें आरक्षण समर्थकों के झुंड के बीच में अकेले खड़ा करके कार्यक्रम के संचालन का जिम्मा एक ऐसे अनाड़ी पत्रकार को सौंप दिया गया था जो बात-बात पर उछल-उछल कर आरक्षण का विरोध करने लगता था। 25 मई को ज़ी न्यूज ने योगेन्द्र यादव से बात करते हुए मीडिया की इस भूल को स्वीकार किया कि उसने 'शायद' आरक्षण के मसले पर दूसरे पक्ष की आवाज को उचित महत्व नहीं देकर गलती की थी। सीएनएन-आईबीएन पर करन थापर अपने कार्यक्रम 'डेविल्स एडवोकेट' में अर्जुन सिंह और कमल नाथ को एन.एस.एस.ओ. के भ्रामक आँकड़ों के जाल में लपेटकर आरक्षण-विरोध को तार्किक आधार देने की विफल कोशिश कर चुके थे। एनडीटीवी पर विनोद दुआ ने भी आरक्षण-विरोधियों द्वारा सुझाए गए कुछ थोथले उपायों को अपने प्रश्न के उत्तरों का विकल्प बनाकर एसएमएस के द्वारा भारतीय जनमत को जानने और शायद आरक्षण के समर्थकों को 'ख़बरदार' करने की कोशिश की, लेकिन नीलोत्पल बसु ने उन्हें कामयाब होने नहीं दिया। अपने चेहरे पर बुरी नीयत और बेशर्मी की परतों को छुपाने के लिए ये स्वनामधन्य पत्रकार श्रोताओं की आवाज के मुखौटे का इस्तेमाल करते हैं। इसी का विरोध करने के लिए 27 मई को दिल्ली में Journalists for Democracy के बैनर तले बड़ी संख्या में जागरूक पत्रकारों ने प्रेस और मीडिया द्वारा आरक्षण के मुद्दे पर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाये जाने के मुद्दे पर एक सेमिनार का आयोजन किया। सेमिनार में पत्रकारों, बुद्धिजीवियों एवं विशेषज्ञों ने प्रेस एवं मीडिया में सवर्णों का वर्चस्व होने और इस वर्चस्व के बल पर आरक्षण के मुद्दे पर एकतरफा, पक्षपातपूर्ण और पूर्वग्रह-प्रेरित रवैया अपनाते हुए आरक्षण-विरोध के आंदोलन को बढ़ावा देने और उसे प्रायोजित करने का आरोप लगाया। इसके साथ ही, यह मांग भी उठाई गई कि मीडिया में भी दलितों एवं पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण होना चाहिए ताकि मीडिया द्वारा लोकतंत्र और संविधान-विरोधी कदम उठाए जाने की किसी कोशिश को नाकाम किया जा सके। एनडीटीवी इंडिया पर 27 मई को 'मुकाबला' कार्यक्रम में भी बहस का मुद्दा यही था कि क्या मीडिया आरक्षण के मुद्दे पर सवर्णों के साथ है, क्या वह आरक्षण-विरोधी आंदोलन का साथ दे रहा है। कार्यक्रम के पैनल में शामिल 6 विशेषज्ञों में से प्रभाष जोशी, अरुण रंजन, निखिल वागले, अपूर्वानन्द जैसे पाँच विशेषज्ञों ने तर्क और सबूत देते हुए यह सिद्ध कर दिया कि मीडिया इस मामले पर सवर्णी पक्षपात की भावना से प्रेरित रहा है और वह पिछड़े वर्गों एवं दलितों के विरोध में सोच-समझकर मुहिम चला रहा है। 'मुकाबला' का संचालन कर रहे दिवांग ने भी यह स्वीकार किया कि आरक्षण के मुद्दे पर अपनी भूमिका के मामले में प्रेस और मीडिया को अपने गिरेबान में झाँकने और निष्पक्ष रवैया अपनाने की जरूरत है। 28 मई को आवाज चैनल पर संजय पुगलिया ने आरक्षण-विरोधियों के तर्कों को प्रत्युत्तर देने के लिए उदित राज को आमंत्रित किया और उन्होंने सारे प्रश्नों का बखूबी उत्तर भी दिया। उसके बाद 29 मई को सीएनएन-आईबीएन के कार्यक्रम 'Face The Nation' में भी आउटलुक पत्रिका के संपादक विनोद मेहता ने प्रमाणों एवं तर्कों के बल पर जोरदार तरीके से सिद्ध किया कि आरक्षण के मुद्दे पर प्रेस और मीडिया का रवैया नितांत आपत्तिजनक, पक्षपातपूर्ण और पत्रकारिता के आदर्शों एवं सिद्धांतों के विपरीत रहा है। हालाँकि इस कार्यक्रम के पैनल में आमंत्रित विशेषज्ञों का अनुपात भी संतुलित नहीं था। लेकिन अकेले विनोद मेहता सचाई का बयान करने के मामले में आरक्षण-विरोध के पक्ष में स्टूडियो में बुलाए गए तीनों आरक्षण-विरोधियों पर भारी पड़े और कार्यक्रम की संचालिका सागरिका घोष ने भी यह स्वीकार किया कि मीडिया का रवैया आरक्षण के मुद्दे पर अब तक पक्षपातपूर्ण रहा है। इस कार्यक्रम में इस विषय पर विशेष रपट भी दिखाई गई कि आरक्षण-विरोधी आंदोलन को संगठित और योजनाबद्ध ढंग से चलाए जाने के लिए कहाँ-कहाँ से वित्तीय मदद और प्रायोजन हासिल हो रहा है। इस रिपोर्ट ने उदित राज के उस आरोप को सप्रमाण साबित कर दिया कि निजी क्षेत्र की बड़ी-बड़ी कंपनियाँ और यहाँ तक कि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ आरक्षण-विरोधी आंदोलन को प्रायोजित कर रही हैं। वैकल्पिक मीडिया जगत यानी अंतर्जाल (इंटरनेट) और चिट्ठों (ब्लॉग) पर भी लगभग ऐसा ही आलम रहा। टाइम्स ऑफ इंडिया की हिमांशी धवन ने इस मुद्दे पर सबसे पहले चिट्ठाकारों की सक्रियता की नब्ज टटोली। चर्चित अंग्रेजी ब्लॉगर रश्मि बंसल ने स्वयं ओ.बी.सी. होते हुए भी आरक्षण के विरोध के तर्कों को सही ठहराने के लिए गंभीर कोशिश की। हिन्दी चिट्ठाकारों में भी हर जगह आरक्षण के विरोध का एक सुर में आलाप चल रहा था। अनेक चिट्ठाकारों ने तो बकायदा अपने चिट्ठे पर लोगो बनाकर यह घोषणा चिपका रखी थी कि "मैं शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण का विरोध करता हूँ"। ऐसे में मैंने इस मुद्दे पर दूसरे पक्ष के तर्कों को विनम्रता से रखते हुए एक सार्थक बहस शुरू करने की पहल करना जरूरी समझा। मेरी आशंका के मुताबिक आरक्षण संबंधी मेरे पहले आलेख पर तीव्र प्रतिक्रियाएँ आईं। एक-दो मित्रों ने आरक्षण के समर्थन में टिप्पणी करने की दिलेरी दिखाई तो उन्हें सामने आने की चुनौती तक दी गई। कुछ दिनों बाद युगल मेहरा ने आरक्षण के समर्थन में कुछ बातें रखने की चेष्टा की। अनूप शुक्ला ने भी अपने अनुभवों के आधार पर आरक्षण की आवश्यकता और उसके महत्व को रेखांकित करने की प्रभावी कोशिश की, जिसका रवि रतलामी ने अपने खास अंदाज में खंडन करने की चेष्टा की। मैंने आरक्षण बनाम योग्यता की बहस के तर्काधार की तह में जाने की भी चेष्टा की और आरक्षण विरोध की असलियत को उजागर करने के लिए एक आलेख लिखा जिसकी अन्यत्र भी काफी चर्चा हुई। हिन्दी चिट्ठाकारों के बीच परस्पर संवाद के लिए बनाए गए नए मंच 'परिचर्चा' पर आरक्षण के मुद्दे पर जोरदार बहस शुरू हुई। बहस का आरंभ करते हुए जीतेन्द्र चौधरी ने मुझे इस बहस में शामिल होने की 'चुनौती' दी। मुझे इस चुनौती की सूचना कुछ देर से मिली, तब तक कुछ अन्य मित्र भी आरक्षण के समर्थन में मोर्चा संभाल चुके थे, जिनमें नीरज दीवान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इस बहस ने कुछ हद तक घमासान रूप ले लिया और दोनों तरफ से जोरदार तर्क और तथ्य प्रस्तुत किए गए। परिचर्चा में जब मैंने आरक्षण-विरोधियों द्वारा दी गई दलीलों का ठोस और तर्कपूर्ण प्रत्युत्तर देना शुरू किया तो उसके बाद वहाँ खामोशी-सी छा गई और फिर उनके पास शायद कोई दलील नहीं बची। यह बहस मीडिया, राजनीति, शिक्षण संस्थानों और समाज में अब भी जारी है। यह मामला अब उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है और सरकार अपने स्तर पर भी वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाली एक विशेष समिति के द्वारा आरक्षण के प्रावधान को लागू करने से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर विचार कर रही है। यह तो तय है कि पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण के मुद्दे पर तमाम विरोध के बावजूद सरकार इस मामले पर कदम वापस ले पाने की स्थिति में नहीं है।

Monday, May 29, 2006

आरक्षण के समर्थन में मुखर अन्य प्रभावी स्वर

  • हंस, जून, 2006

अर्जुनों का विद्रोह

  • The Hindu, 18 June, 2006
The return of discrimination
  • Frontline, 03-16 June, 2006
Pride and prejudice
  • IBN Live.com, 10 June, 2006

No review of quota policy: FM

  • CNN-IBN, 10 June, 2006

Majority of Indians want quota

  • Rediff.com, 10 June, 2006

Quotas and the notion of merit

  • The Hindu, 9 June, 2006

Need for implementation of quota stressed

  • The Times of India, 7 June, 2006

A Useful Category

  • The Hindu, 5 June, 2006

Upper castes dominate national media, says survey in Delhi

  • The Hindustan Times, 5 June, 2006

Some merit to quotas

  • The Hindu, 3 June, 2006

Caste matters in the Indian media

  • The Indian Express, 31 May, 2006

Goodwill, greed and the righting of history

  • YAHOO India News/ANI, 28 May, 2006

'Journalists for Democracy' call for balanced reporting on quota issue

  • Outlook India, 29 May, 2006

Rainbow Warriors

  • दैनिक जागरण, 20 मई, 2006

कुछ बातें आरक्षण के पक्ष में

  • दैनिक जागरण, 11 मई, 2006

सामाजिक परिवर्तन का मार्ग

  • The Times of India, 10 May, 2006

'Scrap Knowledge Commission'

  • The Telegraph, 9 May, 2006

Knowledge Commission divided on education reservation

  • दैनिक हिन्दुस्तान, 8 मई, 2006

आरक्षण का हक बनता है या नहीं?

  • The Telegraph, 29 अप्रैल, 2006

CLASSY CAST OF MIND

  • राष्ट्रीय सहारा, 27 अप्रैल, 2006

आरक्षण : समान प्रतिस्पर्धा के भोथरे तर्क

  • Counter Currents, 18 अप्रैल, 2006

Why Reservation For OBC Is A Must

  • Ambedkar.org, 17 April, 2006

The Other Side of Merit & Mandal II

  • The Hindu, 12 अप्रैल, 2006

Lessons from the new intolerance

  • The Times of India, 11 April, 2006

Mandal-II: It's the age of pro-reservation bloggers

  • Frontline, 22 Oct - 04 Nov, 2005

On reservations in the private sector

  • वागर्थ, अक्तूबर, 2004

लघुकथा : आरक्षण

  • Counter Currents, 22 June, 2004

Reservation For Dalits In Private Sector

नोट : इस संकलन में नई-नई कड़ियों को जोड़े जाने की प्रक्रिया जारी है। आप भी इस विषय पर अन्य महत्वपूर्ण कड़ियों की सूचना अपनी टिप्पणी सहित दे सकते हैं।

Saturday, April 22, 2006

आरक्षण बनाम योग्यता

यह सही है कि आरक्षण का मुद्दा भारत में राजनीतिज्ञों के लिए वोटबैंक को बढ़ाने और बरकरार रखने का हथियार बन चुका है। यह भी सही है कि आरक्षण के प्रावधान से विकास की रफ्तार बाधित होती है। यह भी सही है कि आरक्षण के कारण कुछ योग्य लोग बेहतर अवसरों के लाभ से वंचित रह जाते हैं और उनके स्थान पर अपेक्षाकृत कम योग्य लोगों को वह अवसर मिल जाता है। यह भी सही है कि आरक्षण एक अस्थायी उपाय है जिसे लंबे समय तक लागू नहीं रखा जाना चाहिए। यह भी सही है कि आरक्षण के प्रावधान से जाति-आधारित कटुता बढ़ रही है जिससे सामाजिक समरसता स्थापित करने में अधिक दिक्कत आएगी। कोई भी विवेकशील व्यक्ति उपर्युक्त तथ्यों से असहमत नहीं हो सकता। लेकिन इससे पहले कि आरक्षण के विरोध में आप कोई मोर्चाबंदी करने के लिए निकलें, आपके पास इसका कोई बेहतर और ठोस विकल्प अवश्य होना चाहिए। जिन लोगों को ‘आरक्षण’ दिया जाना आप पसंद नहीं करते, उन्हें संविधान के अनुसार प्रतिष्ठा और अवसर की समानता तथा सामाजिक न्याय प्रदान करने के लिए आपके पास कौन-सा बेहतर वैकल्पिक उपाय है? भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो इसके लिए आरक्षण का ही उपाय किया गया है।

मीडिया का दुरुपयोग करने से बचें यदि आप भारतीय संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखते हैं तो आपको आरक्षण के उस प्रावधान को लागू किए जाने का समर्थन करना चाहिए जिसे भारत की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार भारतीय संविधान के उपबंधों के दायरे में लागू करना चाह रही हो। यदि आपकी आस्था संविधान और लोकतंत्र में नहीं है तो फिर यह ध्यान रखिए कि आप आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान का विरोध भी इसीलिए कर पा रहे हैं क्योंकि भारतीय संविधान और लोकतंत्र ने ही आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार दिया है। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस्तेमाल के मुख्य माध्यम प्रेस और मीडिया पर अपने वर्चस्व की बदौलत यदि आप सरकार को संविधान के विपरीत दिशा में चलाने की कोशिश करना चाह रहे हों तो यह कोशिश आपको बहुत मंहगी पड़ सकती है, क्योंकि प्रेस और मीडिया का सारा कारोबार जिन पाठकों और दर्शकों के भरोसे पर टिका हुआ है उनका बहुमत संवैधानिक प्रावधानों का इस तरह मजाक बनाए जाते देखना पसंद नहीं करेगा और उनसे विमुख हो जाएगा। मीडिया के लोगों को इसकी बानगी उस दिन देखने को मिली जब एन.डी.टी.वी. द्वारा आरक्षण के मुद्दे पर आयोजित परिचर्चा में शामिल होने आए दर्शकों में से पिछड़े वर्ग के बहुत-से युवाओं ने कार्यक्रम के एकपक्षीय संचालन के विरोध में कार्यक्रम का बीच में ही बहिष्कार कर दिया और स्टूडियो से बाहर चले गए। बरखा दत्त ने इस घटना का जिक्र हिन्दुस्तान टाइम्स में संपादकीय पृष्ठ पर छपे अपने आलेख में भी किया। जो मीडिया जनमत का प्रतिनिधित्व नहीं करे और जब थोड़े से सवर्ण पत्रकार स्वयं को भारत का भाग्य विधाता समझकर अपने जातिगत स्वार्थ की पूर्ति और मिथ्या अभिमान की संतुष्टि के लिए संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक व्यवस्था का मजाक बनाने की कोशिश करें तो न केवल वे अपनी विश्वसनीयता गँवा देंगे, बल्कि जनता का बहिष्कार भी झेलने के लिए बाध्य हो जाएंगे। यदि आप वाकई आरक्षण के प्रावधान को लागू होने नहीं देना चाहते हैं तो मीडिया का गलत इस्तेमाल करने के बजाय आपको लोकतांत्रिक चुनाव के जरिए संसद में बहुमत हासिल करना चाहिए और संविधान में संशोधन करके आरक्षण के प्रावधान को हटा देना चाहिए।

क्या हो सकता है आरक्षण का विकल्प आरक्षण का एक कारगर विकल्प हमारे राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने सुझाया कि प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों और केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में जितनी सीटें आरक्षित की जा रही हों, कुल सीटों की संख्या उसी अनुपात में बढ़ा दी जानी चाहिए ताकि गैर-आरक्षित श्रेणी के लिए पहले की तरह अवसर उपलब्ध रहें। इस सुझाव का व्यापक स्वागत हुआ। सीटों की संख्या जितनी बढ़ाई जा सके उतनी बेहतर है ताकि अधिक से अधिक लोगों को उच्च शिक्षा हासिल करने का मौका मिल सके। आदर्श स्थिति तो वह होगी जिसमें हर शिक्षार्थी को पढ़ने को मौका मिले और हर बेरोजगार को रोजगार मिले। लेकिन चूंकि प्रत्याशी अधिक होते हैं और अवसरों की उपलब्धता काफी कम होती है, इसलिए प्रतियोगिता आयोजित कराई जाती है ताकि जो सबसे योग्य हों उन्हें ही सीमित अवसरों का लाभ मिल सके। लेकिन असमान सामाजिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि के प्रत्याशियों के बीच स्वस्थ प्रतियोगिता कदापि नहीं हो सकती। भारत में अभी तक ऐसी व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई है जिसमें किसी प्रतियोगिता के आयोजन से पहले हर प्रत्याशी को उसकी तैयारी के लिए समान सुविधा और समान परिस्थिति उपलब्ध हो सके। आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था में कृष्ण और सुदामा अब एक साथ नहीं पढ़ा करते और कोई कृष्ण अब किसी सुदामा का मित्र नहीं होता। यदि आप आरक्षण के प्रावधान को समाप्त करना चाहते हैं तो पहले आप ऐसी व्यवस्था विकसित कीजिए ताकि किसी प्रतियोगिता में भाग लेने वाले हर प्रतियोगी को समान सामाजिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि उपलब्ध हो सके।

क्या हैं योग्यता के मायने जब आप योग्यता की बात करते हैं और प्रतियोगिता के आयोजन के द्वारा उसका निर्धारण किए जाने की वकालत करते हैं तो पहली बात यह कि प्रतियोगिता का संचालन और योग्यता का निर्धारण करना भी आपके ही हाथों में रहा है, और आपने इसमें आज तक ईमानदारी नहीं दिखाई है। विशेषकर साक्षात्कारों के आधार पर योग्य प्रत्याशी का चयन किए जाने में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की कोई व्यवस्था नहीं होती। सचाई तो यह है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के बहुत से प्रत्याशियों को संवैधानिक उपबंधों के बावजूद आरक्षण के लाभ से लंबे समय तक वंचित ही रखा गया, क्योंकि जिन पदाधिकारियों के अधिकार-क्षेत्र में उन उपबंधों को लागू करने का दायित्व था, वे चाहते नहीं थे कि आरक्षित पदों पर अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोग भर्ती किए जाएँ। इसलिए वे फाइलों पर यह दर्ज करते रहे कि आरक्षित वर्गों के ‘उपयुक्त’ उम्मीदवार उपलब्ध नहीं होने के कारण उनके स्थान पर सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों की भर्ती कर ली गई। ऐसी नियुक्तियों के मामले में जो भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार चलता रहा, उसे उस दौर में सरकारी सेवा में रह चुका हर व्यक्ति जानता है। इस बारे में काफी विरोध होने पर बाद में ऐसे स्पष्ट प्रावधान किए गए ताकि आरक्षित रिक्त पदों को सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों से नहीं भरा जा सके। प्रतियोगिता के जरिए योग्यता के निर्धारण की प्रक्रिया का मुख्य आधार ‘पदानुक्रम’ (Hierarchy) और ‘सर्वोत्तम की उत्तरजीविता’ (Survival of the fittest) का सिद्धांत है। लेकिन आपने प्रतियोगिता के बजाय वर्ण-व्यवस्था के आधार पर पिछले हजारों वर्षों से योग्यता और श्रेष्ठता को अपना जन्मजात अधिकार समझकर समाज के बहुसंख्यक वर्गों को अपने अधीन बनाए रखा। प्रतियोगिता पर आधारित ‘सर्वोत्तम की उत्तरजीविता’ (Survival of the fittest) के सिद्धांत पर अमल करते हुए पहले तुर्कों-मुगलों ने और बाद में अंग्रेजों ने आपके जन्मजात अधिकार को चुनौती दी और आपकी योग्यता और श्रेष्ठता तब धूल चाटने लगी। तब आपमें से अधिकांश अवसरवादी लोग मुगलों और अंग्रेजों की चाटुकारिता में लग गए और जब आजादी मिलने का समय आया तो चूहे की तरह कूदकर सत्ता और सरकार में शामिल हो गए। भारत का स्वतंत्रता संघर्ष तो मुख्य रूप से पिछड़े और दलित वर्ग के लोगों ने लड़ा, लेकिन उसके नेतृत्व पर सवर्ण वर्ग के नेताओं ने अपना वर्चस्व कायम कर लिया।

र्वोदय और आरक्षण आजादी मिलने के बाद पहली बार भारतीय संविधान में ‘सर्वोत्तम की उत्तरजीविता’ के स्थान पर सर्वोदय के सिद्धांत को कार्यान्वित किया गया, हालाँकि बात हमारे यहाँ सदियों से ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ की होती रही है। भारतीय लोकतंत्र का आदर्श स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व पर आधारित सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना है। लोकतांत्रिक भारत में इस आधार पर किसी को प्रतिष्ठा और अवसर की समानता से वंचित नहीं किया जा सकता कि वह आपसे कम योग्य है। यदि कोई फिलहाल आपसे कम योग्य है तो उसकी संभावना का विकास कीजिए और उसे अपने बराबर की प्रतिष्ठा और अवसर दीजिए ताकि वह आपसे स्वस्थ प्रतियोगिता कर सकने में सक्षम बन सके। “प्रत्येक जीव अव्यक्त ब्रह्म है।” हर मानव में विकास करने की असीम संभावना छिपी होती है, उस संभावना का पता लगाइए और उसका विकास करने का अवसर और माहौल दीजिए। भारतीय संविधान में दलित और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान इसीलिए किया गया है। जब पिछड़े वर्गों को सरकारी सेवाओं में आरक्षण दिया जाने लगा तो आपने कहा कि नौकरी में आरक्षण मत दो, उन्हें पढ़ाई-लिखाई की सुविधा दो ताकि पहले वे योग्य हो जाएँ, उसके बाद रोजगार प्राप्त करें। अब जब पढ़ाई-लिखाई के मामले में आरक्षण दिए जाने की बात उठी तो आप कहते हैं कि यह गलत हो रहा है, योग्यता का गला घोंटा जा रहा है और शिक्षा का स्तर बिगाड़ा जा रहा है। अब आप उच्च शिक्षा में आरक्षण का विरोध कर रहे हैं। संविधान लागू होने के बाद 40 वर्ष तक आपलोगों ने ऐसा कुछ क्यों नहीं किया ताकि पिछड़े वर्गों को आरक्षण की जरूरत नहीं पड़ती। जब संविधान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के साथ-साथ सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े अन्य वर्गों को भी आगे लाने के लिए विशेष उपाय किए जाने की बात कही गई तो उनपर अमल क्यों नहीं किया गया। सच बात यह थी कि आपकी नीयत नहीं थी उन्हें बराबरी का हक़ देने की। जब उनमें राजनीतिक और सामाजिक चेतना का विकास हुआ तो वे लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीकों से अपना हक़ हासिल करने की चेष्टा में लगे हैं।

सामाजिक न्याय और राजनीतिक मजबूरी यह ठीक है कि 1990 में मंडल आयोग की कुछ सिफारिशों को लागू करके कुछ राजनेताओं ने अपनी राजनीति खूब चमकाई। उसी के बाद सामाजिक न्याय का मुद्दा हर राजनीतिक दल की ज़बान पर चढ़ा। पिछड़े वर्गों का पहली बार ऐसा ध्रुवीकरण हुआ कि वह दलित वर्ग से भी बड़ा वोट बैंक बनकर उभरा जिसको अपने पाले में करना सत्ता हासिल करने की ख्वाहिश रखने वाले हर राजनीतिक दल की मजबूरी हो गई। हालाँकि दोनों बड़े राजनीतिक दल -- कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी सामाजिक न्याय की राजनीति को आत्मसात नहीं कर पाए। लेकिन पिछड़े डेढ़ दशक में इन दोनों राजनीतिक दलों को भलीभाँति अनुभव हो गया कि सामाजिक न्याय के मुद्दे को छोड़कर भारतीय राजनीति में सत्ता हासिल कर पाना संभव नहीं है। भारतीय जनता पार्टी ने मंडल की काट के लिए कमंडल के अस्त्र को आजमाया, लेकिन वह अधिक दिनों तक कारगर साबित नहीं हो पाया। कांग्रेस पार्टी ने आर्थिक ‘सुधारों’ और निजीकरण के द्वारा भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा के जरिए विकास के सिद्धांत को स्थापित करने की रणनीति अपनाई। लेकिन उसे मालूम है कि इससे चुनाव जीते नहीं जा सकते, इसलिए उसे भी मजबूर होकर शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण और निजी क्षेत्रों में आरक्षण के मुद्दे को अपनाना पड़ा। वामपंथी पार्टियाँ आर्थिक न्याय की राजनीति पर जोर दिए जाने की वकालत करती रही, लेकिन सत्ता से जुड़े रहने के बावजूद ठोस धरातल पर वे इस दिशा में कुछ भी कारगर प्रयास नहीं कर सकीं। जो चरमपंथी वामपंथी पार्टियाँ थी उनलोगों ने नक्सलवाद के रूप में आर्थिक न्याय को हासिल करने के लिए एक ऐसी राह पकड़ ली, जो लोकतंत्र और संविधान के ही विपरीत दिशा में काम करता है।

स्थायी समाधान आरक्षण का स्थायी विकल्प यही हो सकता है कि आप सबके लिए पर्याप्त अवसर पैदा कर दें ताकि किसी को आरक्षण देने की नौबत ही नहीं आए। दूसरा समाधान यह कि व्यक्ति अपनी योग्यता और अभिरुचि के अनुसार चाहे जो भी वैध रोजगार करे और उसकी आमदनी चाहे जितनी कम हो, उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा और जीवन के लिए उपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित की जाए। प्रकृति ने मनुष्यों में प्रतिभा, क्षमता और अभिरुचि की विविधता प्रदान की है, लेकिन मनुष्यों ने उस विविधता को पदानुक्रम का पैमाना बना लिया है। जब तक पदानुक्रम की मानसिकता समाप्त नहीं होती, तब तक आरक्षण का प्रावधान भी जारी रहेगा।

Friday, April 14, 2006

प्रायोजित आरक्षण-विरोध का पर्दाफाश

पिछड़े वर्गों के लिए केन्द्रीय विश्वविद्यालयों और शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण से संबंधित केन्द्र सरकार के प्रस्ताव पर विरोध को रणनीतिक ढंग से प्रायोजित करने के लिए कुछ पत्रकारों ने जिस तरह से पत्रकारिता के मानदंडों की धज्जियाँ उड़ाते हुए अपनी जाति दिखायी है, उससे भारतीय पत्रकारिता के आदर्शों को धक्का लगा है। पत्रकारिता को इस तरह शर्मसार किया जाना ‘द हिन्दू’ से नहीं देखा गया और उसके राजनीतिक संपादक हरीश खरे ने 12 अप्रैल, 2006 को अपने संपादकीय आलेख “Lessons from the new intolerance” में ऐसे कुछ सवर्ण पत्रकारों द्वारा लॉबिंग करके आरक्षण के विरोध को प्रायोजित करने और पत्रकारिता के हथियार का इस्तेमाल करके आरक्षण संबंधी नए प्रस्ताव को कार्यान्वित नहीं करने हेतु सरकार पर दबाव बनाने की साजिश का पर्दाफाश कर दिया। इस आलेख में उन्होंने कुछ अख़बारों और समाचार चैनलों द्वारा आरक्षण विरोध को तूल देने और उसे फुलाकर एक बड़ी खबर बना देने के लिए घटिया तौर-तरीके अपनाने की प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य किया है। इससे भी अधिक हास्यास्पद तो उन्होंने चुनाव आयोग के ईमानदार आयुक्तों द्वारा मीडिया के इस बहकावे में बह जाने की मानसिकता को माना है। कुछ समाचार पत्रों और समाचार चैनलों ने हर संभव कोशिश की ताकि मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह को खलनायक साबित किया जाए और विवादों से बचने की कोशिश करने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मजबूर होकर उनके आरक्षण संबंधी प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दें। उनकी तरकीब कुछ समय के लिए कारगर भी साबित होती दिखाई दी, जब चुनाव आयोग ने अर्जुन सिंह से इस विषय पर स्पष्टीकरण मांग लिया और मंत्रिमंडल सचिव ने आरक्षण संबंधी प्रस्ताव को चुनाव आयोग की अनापत्ति की शर्त जोड़ते हुए वापस कर दिया। समाचार चैनलों और अख़बारों द्वारा ‘योग्यता’ के पक्ष में मुखर स्वरों की खोज करने के लिए जिस तरह से कैमरामैन और पत्रकारों की टीम चुनिंदा जगहों पर भेजी गई और उन्हें एकपक्षीय और पक्षपाती ढंग से प्रस्तुत किया गया, उससे भी अधिक शर्मनाक था इस विषय पर परिचर्चाओं का संचालन। इस तरह की सभी परिचर्चाओं का संचालन निरपवाद रूप से सवर्ण पत्रकारों द्वारा किया गया। पैनल में चर्चा का उत्तर देने के लिए बुलाए गए विशेषज्ञों और मंत्रियों के सामने केवल सवर्ण आरक्षण-विरोधी दर्शकों के सवाल रखे जाते रहे। बहस के निष्कर्ष और तर्क परिचर्चा के संचालकों के मन में पहले ही से निर्धारित थे। कहीं भी परिचर्चा में दोनों पक्षों को समान अवसर देने की न्यूनतम शिष्टता नहीं दिखाई गई, जिसकी हर पत्रकार से अपेक्षा की जाती है। इस देश में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण के पक्षधरों की संख्या उसके विरोधियों की संख्या से कम से कम चौगुनी है। लेकिन इन स्वनामधन्य पत्रकारों को पूरे देश में आरक्षण के पक्ष में बोलने वाला प्रतिभाशाली व्यक्ति खोजने से भी नहीं मिला। उनकी नज़रों में पिछड़े वर्ग के सारे लोग ही प्रतिभाहीन थे। यहाँ तक कि उनलोगों ने पिछड़े वर्ग के समुदाय में से भी आरक्षण-विरोधी खोजकर निकाल लिए। कुछ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में सवर्ण संपादकों ने आरक्षण के पक्षधर पत्रकारों की आवाज को दबाने की पूरी कोशिश की। इस स्थिति ने आरक्षण के मुद्दे पर सवर्ण और असवर्ण पत्रकारों के बीच अंदरूनी विभाजन को भी जन्म दे दिया। ऐसे में ‘द हिन्दू’ के उपर्युक्त आलेख ने आरक्षण के मुद्दे पर पत्रकारों को संतुलित और निष्पक्ष दिशा में सोचने और देखने के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया है।

Tuesday, April 11, 2006

आरक्षण पर शरद यादव की राय

मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले शरद यादव ने बी.बी.सी. के साथ बातचीत में उन राजनीतिक परिस्थितियों का खुलासा किया है, जिसमें पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का रास्ता खोल पाना संभव हो पाया।

विश्वनाथ प्रताप सिंह की राय

पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण के संबंध में मंडल आयोग की सिफारिशों को आंशिक रूप से लागू करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बी.बी.सी. के साथ इस विषय पर एक बातचीत में अपने दृष्टिकोण को साफगोई के साथ व्यक्त किया।

Sunday, April 09, 2006

पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण पर बहस

वर्चस्व और प्रतिरोध की पृष्ठभूमि समाज में शांति, सौहार्द और समरसता स्थापित करने के लिए समानता और स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना अनिवार्य है। लेकिन भारतीय समाज में समानता और स्वतंत्रता कभी वास्तविकता नहीं रही। पुरातन काल से ही हमारे यहाँ व्यक्ति को समाज की स्वतंत्र इकाई के रूप में देखने के बजाय उन्हें जाति और वर्ण व्यवस्था के दायरे में आबद्ध माना जाता रहा। वर्ण-व्यवस्था का सूत्रपात करते समय भले ही गुण और कर्म के सिद्धांत का तर्काधार प्रस्तुत किया गया हो, लेकिन भारतीय समाज के इतिहास के अध्ययन से पता चलता है कि यह व्यवस्था दरअसल समाज को पदानुक्रम के साँचे में ढालने के लिए बनाई गई थी। यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने-अपने संस्कार और स्वभाव के अनुरूप कार्य करते हुए भी सामाजिक धरातल पर समान माने जाते तब तो कोई समस्या ही नहीं थी। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कभी नहीं हो सका। ब्राह्मण अपने को समाज में हमेशा सर्वश्रेष्ठ और बाकी वर्ण के लोगों को हीन मानते रहे। वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच आजीवन यही सिद्ध करने के लिए संघर्ष चलता रहा कि ब्राह्मण और क्षत्रिय में से श्रेष्ठ कौन है। परशुराम ने तो धरती को क्षत्रिय-विहीन कर देने की शपथ ले रखी थी और हजारों क्षत्रियों को अपने फरसे से मौत के घाट उतार दिया था। राहुल सांकृत्यायन ने ‘वोल्गा से गंगा तक’ में प्राचीन भारत में जातीय श्रेष्ठता के अभिमान को लेकर चलने वाले ऐसे रक्तरंजित संघर्षों का सविस्तार वर्णन किया है। परशुराम को जब अपने प्रतिभाशाली और गुरुभक्त शिष्य कर्ण के बारे में यह ज्ञात हुआ कि वह ब्राह्मण नहीं, बल्कि एक क्षत्रिय है तो उसे श्राप दे दिया कि जब उसे धनुर्विद्या का उपयोग करने की सर्वाधिक जरूरत होगी तब वह सारी विद्या भूल जाएगा। धनुर्विद्या के कौशल की प्रतियोगिता में कर्ण को इस आधार पर बाहर रखने का प्रयास किया गया कि वह सारथी का पुत्र होकर क्षत्रियों और राजकुमारों के समकक्ष अवसर नहीं हासिल कर सकता। अत्यंत प्रतिभाशाली होने के बावजूद एकलव्य को द्रोणाचार्य ने धनुर्विद्या की शिक्षा देने से इसलिए इनकार कर दिया क्योंकि वह भील जाति का था और जब उसने स्वयं अपनी लगन और मेहनत से वह विद्या हासिल कर ली तब द्रोण ने छल से दक्षिणा के रूप में उसका दाहिना अंगूठा मांग लिया ताकि वह अपनी विद्या का उपयोग नहीं कर सके। एकांत वन में मौन ध्यान में लीन शूद्र ऋषि शंबूक की हत्या ब्राह्मणों ने दबाव डालकर श्रीराम के हाथों इसलिए करवा दी ताकि वह ब्रह्मज्ञानी न बन जाए। फिर भी, प्राचीन भारत में महर्षि अगस्त्य, बाल्मीकी जैसे कई बह्मज्ञानी और महाकवि हुए जो उपेक्षित जातियों में जन्म लेने के बावजूद अपनी प्रतिभा की श्रेष्ठता और विशिष्टता साबित कर पाने में सफल रहे। बुद्ध के मार्ग में भी ब्राह्मणों ने बहुत रोड़े अटकाए, क्योंकि वह वर्चस्ववादी वर्ण-व्यवस्था के स्थान पर समानता पर आधारित सामाजिक व्यवस्था की प्रतिष्ठा करना चाह रहे थे। शंकराचार्य और उनके अनुयायियों ने तो बौद्ध धर्म का भारत से उन्मूलन करने के लिए हर संभव कोशिशें कीं, क्योंकि बौद्ध धर्म समाज के पिछड़े और दलित वर्ग के लोगों को बराबरी के धरातल पर लाने का सफल आंदोलन चला रहा था। पिछले पाँच हजार वर्षों में ऐसे हजारों उदाहरण हैं जब स्वयं को श्रेष्ठ कहने वाली जाति के लोगों ने अन्य जाति के प्रतिभाशाली लोगों को आगे बढ़ने से रोकने की हर संभव कोशिशें कीं। कबीर जुलाहे के घर में पले-बढ़े थे, इसीलिए उन्हें ब्राह्मणों से उपेक्षा और अपमान झेलनी पड़ी। ब्राह्मण रामानन्द जब जुलाहे कबीर को दीक्षा देने के लिए तैयार नहीं हुए तो कबीर को उनसे गुरुदीक्षा लेने के लिए अँधेरे में बनारस के घाट की सीढ़ियों पर लेटने का उपाय निकालना पड़ा ताकि अनजाने में रामानन्द के पैर उन पर पड़ जाएँ। जब एक दिन ऐसा ही हुआ तो घबराकर अनजाने में रामानन्द के मुख से निकले “राम-राम” को ही कबीर ने अपना गुरु-मंत्र मान लिया। कबीर ने अपने जीवन में जो व्यथा झेली वही उनकी कविता और उपदेशों में वर्चस्ववादी वर्णाश्रम-व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिरोध के तीव्र स्वर के रूप में अभिव्यक्त हुआ। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को जब उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला तो उन्होंने साबित कर दिखाया कि यदि दलित वर्ग के लोगों को अपनी प्रतिभा को निखारने का मौका मिले तो वे तथाकथित ऊँची जाति के लोगों से बेहतर उपलब्धि हासिल कर सकते हैं। लेकिन वर्ष 1950 में भारतीय संविधान लागू होने से पहले तक पिछड़े और दलित वर्गों के जो भी व्यक्ति अपनी प्रतिभा को विकसित कर पाने में सफल हुए वे या तो जबरदस्त जीवट वाले व्यक्ति थे जो समस्त प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद अध्यवसाय के बल पर अपनी श्रेष्ठता साबित कर सके या फिर उन्हें संयोगवश ऊँची जातियों के ही किसी विरले उदार महापुरुष का सानिध्य मिल गया। पिछड़े वर्ग के महात्मा गाँधी को भी गोखले और तिलक का वरदहस्त मिल जाने से उन्हें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नेतृत्व पर सहजता से स्थापित होने में मदद मिली थी। संविधान में शामिल उपबंध स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान विकसित हुए मानवीय मूल्यों के आधार पर निर्मित भारतीय संविधान में आरक्षण का प्रावधान किए जाने के बाद पहली बार दलित वर्ग अर्थात् अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों को संवैधानिक अधिकार के रूप में प्रतिष्ठा और अवसर की समानता मिल सकी। संविधान के अनुच्छेद 46 के अंतर्गत राज्य की नीति के निदेशक तत्व के रूप में उपबंध किया गया कि “राज्य, जनता के दुर्बल वर्गों के, विशिष्टतया, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से उनकी संरक्षा करेगा।” सरकार ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के उत्थान और उनको समानता के स्तर पर लाने के लिए कई आवश्यक कदम तुरंत उठा लिए और यह सिलसिला अब भी जारी है। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सरकारी सेवाओं में सीधी भर्ती के मामले में आरक्षण 21 सितम्बर, 1947 से और पदोन्नति के मामले में आरक्षण 4 जनवरी, 1957 से ही लागू है। लेकिन आरक्षण के लाभ से सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े अन्य वर्गों के बहुसंख्यक लोगों को वंचित ही रखा गया, क्योंकि कई दशकों तक इन पिछड़े वर्गों की स्पष्ट पहचान ही स्थापित नहीं हो सकी। हालाँकि संविधान में इसके लिए स्पष्ट उपबंध मौजूद रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 340(1) में उपबंध है कि “राष्ट्रपति भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की दशाओं के और जिन कठिनाइयों को वे झेल रहे हैं उनके अन्वेषण के लिए और उन कठिनाइयों को दूर करने और उनकी दशा को सुधारने के लिए संघ या किसी राज्य द्वारा जो उपाय किए जाने चाहिएं उनके बारे में और उस प्रयोजन के लिए संघ या किसी राज्य द्वारा जो अनुदान किए जाने चाहिएं और जिन शर्तों के अधीन वे अनुदान किए जाने चाहिएं उनके बारे में सिफारिश करने के लिए, आदेश द्वारा, एक आयोग नियुक्त कर सकेगा जो ऐसे व्यक्तियों से मिलकर बनेगा जो वह ठीक समझे और ऐसे आयोग को नियुक्त करने वाले आदेश में आयोग द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया परिनिश्चित की जाएगी।” आगे अनुच्छेद 340(2) में कहा गया है कि “इस प्रकार नियुक्त आयोग अपने को निर्देशित विषयों का अन्वेषण करेगा और राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देगा, जिसमें उसके द्वारा पाए गए तथ्य उपवर्णित किए जाएंगे और जिसमें ऐसी सिफ़ारिशें की जाएंगी जिन्हें आयोग उचित समझे।” अनुच्छेद 340(3) के अनुसार “राष्ट्रपति, इस प्रकार दिए गए प्रतिवेदन की एक प्रति, उस पर की गई कार्रवाई को स्पष्ट करने वाले ज्ञापन सहित, संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगा।” संविधान के अनुच्छेद 15 के अंतर्गत धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध करने के लिए उपबंध करते समय अनुच्छेद 15(4) के अंतर्गत यह परंतुक जोड़ा गया है कि “इस अनुच्छेद की या अनुच्छेद 29 के खंड (2) की कोई बात राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।” इसी तरह संविधान के अनुच्छेद 16 के अंतर्गत लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानता के संबंध में उपबंध करते हुए अनुच्छेद 16(4) के अंतर्गत यह परंतुक भी जोड़ा गया है कि “इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।” हाल ही में 20 जनवरी, 2006 को अधिनियमित 93वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा अंत:स्थापित अनुच्छेद 15(5) के अनुसार, “इस अनुच्छेद या अनुच्छेद 19 के खंड (1) के उप-खंड (छ) की कोई बात राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के लिए विधि द्वारा कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी, जहाँ तक ऐसे विशेष उपबंध, अनुच्छेद 30 के खंड (1) में उल्लिखित अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों को छोड़कर, निजी शैक्षिक संस्थानों सहित शैक्षिक संस्थानों, चाहे वे राज्य से सहायता प्राप्त हों या गैर-सहायता प्राप्त हों, में प्रवेश से संबंधित हों।” पिछड़ा वर्ग आयोगों की सिफारिशें जैसा कि उपर्युक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि संविधान में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण एवं अन्य विशेष प्रावधान किए जाने के संबंध में कई बार उल्लेख किया गया है, लेकिन इसके लिए पिछड़े वर्गों की पहचान को स्पष्ट करने और उनकी पहचान के लिए मानदंड निर्धारित किए जाने की आवश्यकता थी। इसलिए, अनुच्छेद 340 का अनुपालन करते हुए पहली बार राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने 29 जनवरी, 1953 को काका कालेलकर की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया। इस आयोग ने अपनी सिफारिशें 30 मार्च, 1955 को सरकार को सौंप दी। अपने प्रतिवेदन में कालेलकर आयोग ने 2399 पिछड़ी जातियों को सूचीबद्ध किया जिनमें से 837 को ‘अति पिछड़ा’ घोषित किया गया। इस आयोग ने सभी महिलाओं को पिछड़ी जाति के अंतर्गत शामिल किए जाने और सभी तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों में पिछड़े वर्गों के लिए 70% सीटों के आरक्षण की सिफारिश की थी। इसके अलावा सभी सरकारी सेवाओं और स्थानीय निकायों में क्लास I पदों के लिए 25%, क्लास II पदों के लिए 33.5% तथा क्लास III और IV पदों के लिए 40% स्थान पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित करने की सिफारिश की गई थी। यदि भारतीय समाज में पिछड़े वर्गों की जनसंख्या के आधार पर शिक्षा और सेवा में उनको वास्तविक प्रतिनिधित्व देने की बात की जाए तो वे सिफारिशें बहुत हद तक न्यायसंगत थीं। लेकिन उस दौर के राजनीतिक परिदृश्य में पिछड़े वर्गों का नेतृत्व इतना संगठित और जागरूक नहीं था कि उन सिफारिशों पर अमल करवाने के लिए सरकार पर कोई सशक्त दबाव बना पाता। सत्ता, सरकार और राजनीति में अगड़ी कही जाने वाली जातियों का बोलबाला था। काका कालेलकर आयोग की सिफारिशें उस दौर के राजनीतिक हालात में अति क्रांतिकारी थीं, इसलिए उनका हश्र वही हुआ जो सुनिश्चित ही था। पंडित नेहरू की सरकार ने वे सिफारिशें बिल्कुल खारिज कर दीं। उसके बाद कांग्रेस की सरकारों ने पिछड़े वर्गों से संबंधित संवैधानिक उपबंधों को कार्यान्वित करने की दिशा में कोई सुगबुगाहट नहीं दिखाई। आपातकाल के बाद लोकनायक जयप्रकाश के आंदोलन की लहर में बनी जनता पार्टी की सरकार ने 1 जनवरी, 1979 को बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया। मंडल आयोग ने अपनी सिफारिशें दिसम्बर, 1980 में सरकार को सौंप दीं। लेकिन तब तक जनता पार्टी की सरकार बिखर चुकी थी और सत्ता की बागडोर फिर से कांग्रेस पार्टी के हाथ में आ चुकी थी। इसलिए मंडल आयोग की सिफारिशें भी उस समय सरकार के ठंडे बस्ते में डाल दी गईं। मंडल आयोग ने अपनी सिफारिशों में कहा कि यद्यपि अन्य पिछड़े वर्गों की जनसंख्या देश की कुल जनसंख्या का लगभग 52% है, लेकिन 50% से अधिक आरक्षण नहीं होने की कानूनी बाध्यता को ध्यान में रखते हुए पहले से अनुसूचित जाति को तथा अनुसूचित जनजाति को उनकी जनसंख्या के अनुपात में दिए जा रहे क्रमश: 15% तथा 7.5% आरक्षण को बरकरार रखते हुए पिछड़ी जातियों के लिए 27% आरक्षण की गुंजाइश बचती है, लिहाज़ा उन्हें कम से कम 27% आरक्षण दिया ही जाना चाहिए। मंडल आयोग ने अपनी सिफारिशों में स्पष्ट रूप से यह कहा कि अन्य पिछड़े वर्ग के जो प्रतियोगी प्रतिभा के आधार पर सामान्य श्रेणी के अंतर्गत सफल होते हैं, उन्हें अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित 27% सीटों के दायरे में नहीं समायोजित किया जाना चाहिए। इसके अलावा, नहीं भरी जा सकी आरक्षित सीटों को तीन वर्षों तक आगे बरकरार रखा जाना चाहिए। अन्य पिछड़े वर्गों के मामले में भी प्रत्येक श्रेणी के पद के लिए उसी प्रकार की रोस्टर प्रणाली अपनायी जानी चाहिए जैसा कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के मामले में अपनायी जाती है। इसके अलावा भर्ती के लिए उच्चतम आयु सीमा में अन्य पिछड़े वर्ग के प्रत्याशियों को भी छूट दी जानी चाहिए। मंडल आयोग ने अपनी सिफारिशों के संबंध में बल देते हुए यह कहा कि इन्हें केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों तथा सरकारी उपक्रमों तथा राष्ट्रीयकृत बैंकों में की जाने वाली सभी भर्तियों के मामले में लागू किया जाना चाहिए। इसके अलावा, निजी क्षेत्र के उन सभी संगठनों में भी उपर्युक्त आधार पर आरक्षण को लागू किया जाना चाहिए जो किसी न किसी रूप में सरकार से आर्थिक सहायता लेते हैं। इन सिफारिशों में कहा गया कि दूसरे चरण में, सभी स्तरों पर पदोन्नति तथा सभी विश्वविद्यालयों और शैक्षिक संस्थाओं में भी आरक्षण की उपर्युक्त योजना को लागू किया जाना चाहिए। कालचक्र ने दिया अनुकूल अवसर जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है कि मंडल आयोग की सिफारिशों को इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली काँग्रेसी सरकारों ने जानबूझकर ठंडे बस्ते में डाले रखा। लेकिन 1989 में संयुक्त मोर्चे की सरकार का नेतृत्व कर रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सरकार से अलग हुए देवीलाल की चुनौती का सामना करने के लिए आनन-फानन में 7 अगस्त, 1990 को घोषणा कर दी कि सरकारी सेवाओं और सरकारी उपक्रमों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27% स्थान आरक्षित किए जाने संबंधी मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाएगा। मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के संबंध में विश्वनाथ प्रताप सिंह की न तो पहले से कोई योजना नहीं थी और न ही वह सामाजिक न्याय की विचारधारा को मानने वाले नेता थे। यहाँ तक कि घोषणा करने से पहले उन्होंने अपने मंत्रिमंडल के सबसे घनिष्ठ सहयोगियों बीजू पटनायक, रामकृष्ण हेगड़े, यशवंत सिन्हा और अरुण नेहरु से भी कोई परामर्श नहीं किया था। सरकार को समर्थन कर रही वामपंथी पार्टियाँ और भारतीय जनता पार्टी भी इस घोषणा से क्षुब्ध थीं। देवीलाल और चन्द्रशेखर तक ने उन सिफारिशों को इतनी हड़बड़ी में लागू किए जाने पर खुलकर आलोचना की थी। प्रेस और मीडिया ने भी, जिसमें ऊँची जातियों के लोगों का वर्चस्व है, इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर आरक्षण का मुखर विरोध ही किया। तात्पर्य यह कि तथाकथित ऊँची जातियों का कोई भी व्यक्ति वास्तव में पिछड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण का संवैधानिक अधिकार दिए जाने के पक्ष में नहीं था। शायद कालचक्र ही घूमते-घूमते उस घड़ी में आ पहुँचा था जब हजारों वर्षों के अन्याय, उपेक्षा और तिरस्कार के बाद पिछड़े वर्गों के दिन फिर से सँवरने वाले थे। यही कारण रहा होगा इसीलिए हिंसक विरोध और उत्तेजक प्रतिक्रिया के बावजूद विश्वनाथ प्रताप सिंह का निश्चय अटल रहा और अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों को सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण दिए जाने का प्रावधान कार्यान्वित हो गया। हालाँकि उस समय मंडल आयोग की सिफारिशें आंशिक रूप से ही लागू की जा सकीं। विश्वविद्यालयों एवं शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण अब एक बार फिर पिछड़े वर्गों के लिए अनुकूल स्थितियाँ बन रही हैं, जब मंडल आयोग की कुछ अन्य सिफारिशों को लागू करने का प्रस्ताव किया जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि इस बार यह प्रस्ताव कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार की ओर से आया है। हालाँकि इस मामले में सरकार के इरादे की गंभीरता संदेह के दायरे में है। संविधान के अनुच्छेद 15(5) के अधीन केन्द्रीय विश्वविद्यालयों और केन्द्र सरकार द्वारा वित्तपोषित शैक्षिक संस्थाओं में अन्य पिछले वर्ग के छात्रों को 27% आरक्षण दिए जाने का मौजूदा प्रस्ताव मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह की ओर से आया है जो मौजूदा सरकार और कांग्रेस पार्टी में इतनी प्रभावी स्थिति में नहीं हैं कि इस प्रस्ताव को अपने दम पर कार्यान्वित करवा सकें। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी की तरफ से इसके पक्ष में कोई बयान तक नहीं आया है। राजनीति के जानकार इस प्रस्ताव को कुछ राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं। कुछ जानकार इसे तीसरे मोर्चे के एक बार फिर से संगठित होने की कवायद के आगे बढ़ने से पहले ही उसे मात देने की कांग्रेसी पहल के रूप में देख रहे हैं। लेकिन प्रेस और मीडिया का एक बड़ा वर्ग हमेशा की तरह आरक्षण के इस प्रस्ताव पर शुरू से विरोध का झंडा बुलंद करने में जुट गया है। प्रेस और मीडिया जनता को मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार और सूचना के अधिकार का ही उपयोग करते हुए अपना व्यवसाय चलाता है, लेकिन उसमें 95% प्रतिनिधित्व ऊँची जातियों का है, वह भारतीय समाज का सही प्रतिनिधित्व नहीं करता, इसलिए वह पिछड़ी जातियों को संविधान-सम्मत अधिकारों से वंचित करने के लिए अपनी मुहिम में एक बार फिर से संगठित रूप से जुट गया है। आरक्षण संबंधी संवैधानिक प्रावधानों का मखौल उड़ाने और उनके विरोध को प्रायोजित करने की उसकी यह रणनीति दरअसल उसकी विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा को ही प्रभावित करेगी। पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण का विरोध करते समय प्रगतिशील बौद्धिकता और सामाजिक न्याय के आवरण को ओढ़े रखने की कोशिश करने वालों इन पत्रकारों और ‘विशेषज्ञों’ की ओर से अकसर आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने की वकालत की जाती है। वे दरअसल भलीभाँति जानते हैं कि परिश्रम, शिल्प-कौशल और अध्यवसाय से संपन्न पिछड़ा वर्ग परिस्थिति की तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद अपनी आर्थिक स्थिति को लगातार मजबूत करने के उद्यम में लगा रहता है, भले ही उसके लिए शिक्षा और सत्ता के दरवाजे बंद कर दिए गए हों। यदि आरक्षण का आधार आर्थिक हो और उसके लिए राजस्व अधिकारियों द्वारा जारी आय प्रमाण पत्र ही मानदंड हो तो अन्य पिछड़े वर्ग के लोग शायद ही आरक्षण का लाभ उठा पाएँ, क्योंकि समाज और सत्ता में पहले से प्रभावी ऊँची जाति के लोग पिछड़ी जाति के व्यक्तियों को अपेक्षित आय प्रमाण पत्र ही जारी नहीं होने देंगे। पूरे देश भर में राजस्व अधिकारियों द्वारा आय प्रमाण पत्र जारी किए जाने की प्रक्रिया में जो भ्रष्टाचार और लालफीताशाही है उसको देखते हुए आय प्रमाण पत्र को आरक्षण का आधार बनाया जाना न्यायोचित भी नहीं है। दूसरी बात यह कि आरक्षण का मूल प्रयोजन पिछड़े वर्गों के शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करना और सत्ता में उनकी भागीदारी को जनसंख्या में उनके अनुपात के स्तर तक बढ़ाना है, ताकि उन्हें संविधान में घोषित प्रतिष्ठा और अवसर की समानता हासिल हो सके। हमारे समाज में प्रतिष्ठा और अवसर की समानता शिक्षा और सत्ता के स्तर के आधार पर तय होती है, न कि आर्थिक आधार पर। आरक्षण-विरोधियों द्वारा दूसरा सबसे बड़ा तर्क यह दिया जा रहा है कि आरक्षण के प्रावधान से प्रतिभा के सही विकास में बाधा आएगी और पिछड़ी जाति के कमजोर प्रतियोगी प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए आयोजित प्रतियोगिता परीक्षा में ऊँची जाति के प्रतिभाशाली प्रतियोगियों की तुलना में कम अंक हासिल करने के बावजूद आरक्षण के आधार पर आगे निकल जाएंगे जिससे न सिर्फ उन शैक्षिक संस्थानों की उत्कृष्टता प्रभावित होगी, बल्कि उन संस्थानों से शिक्षा हासिल करके जो पेशेवर निकलेंगे उनकी योग्यता का स्तर भी अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप नहीं होगा। ये महानुभाव लोग भी अपने पुरखों की तरह मानकर चल रहे हैं कि प्रतिभा ऊँची जाति के साधन-सत्ता संपन्न लोगों की बपौती होती है जो केवल उन्हें ही जन्मजात मिलती है। उनका मानना है कि जो लोग उनकी बनाई हुई जाति-व्यवस्था में अपने पिछले जन्मों के अज्ञात बुरे कर्मों की वजह से पिछड़ी जाति के अनपढ़ माँ-बाप के घर में पैदा होते हैं उनके पास प्रतिभा हो ही नहीं सकती है। ऊँची जातियों के इस खुल्लमखुल्ला बेशर्म पक्षपात, अन्याय और दंभ के बावजूद पिछले पाँच हजार वर्षों में और विशेषकर भारतीय संविधान के लागू होने के बाद पिछड़े और दलित वर्गों के लाखों लोगों ने तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद बारंबार यह साबित किया है कि प्रतिभा तथाकथित ऊँची जातियों की बपौती नहीं होती, बल्कि प्रकृति के नैसर्गिक वरदान की तरह सर्वत्र विद्यमान रहती है, उसे केवल विकास के लिए अनुकूल माहौल की आवश्यकता होती है। प्राय: हर प्रतियोगिता परीक्षा के परिणाम में इस तथ्य को सहज ही देखा जा सकता है कि पिछड़े वर्ग के बहुत से छात्र आरक्षण का लाभ उठाए बगैर सामान्य श्रेणी के दायरे में प्रतिभा सूची में स्थान हासिल करने में सफल रहते हैं। फिर भी, विश्वविद्यालयों और शैक्षिक संस्थानों में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का लाभ उनके अंदर छिपी प्रतिभा के विकास के लिए अनुकूल माहौल प्रदान करने के उद्देश्य से जरूरी है, क्योंकि प्रतिभा के विकास का समान अवसर दिए जाने के बाद ही स्वस्थ प्रतियोगिता संभव हो सकती है। जिन परिस्थितियों में भी संभव हो, यदि कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार पिछड़े वर्गों के लिए विश्वविद्यालयों और शैक्षिक संस्थाओं में 27% आरक्षण के प्रावधान को लागू करा पाती है तो ऐसा करके वह न सिर्फ अपने संवैधानिक दायित्वों की पूर्ति करेगी, बल्कि अपने अपराध-बोध को भी कुछ हद तक कम कर सकेगी जो उसने पिछड़े वर्गों के प्रति पिछले 60 वर्षों में बरती लगातार उपेक्षा के कारण उनका समर्थन गँवाकर अर्जित की है। पदोन्नति में आरक्षण और निजी क्षेत्र में आरक्षण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की ही तरह पिछड़े वर्गों के लिए भी सरकारी सेवाओं में पदोन्नति के मामले में आरक्षण के प्रावधान को लागू किए जाने का मामला लंबे समय से उठाया जाता रहा है। मंडल आयोग की सिफारिशों में यह मुद्दा भी शामिल था। 1990 में सरकारी सेवाओं में भर्ती के समय आरक्षण दिए जाने के मामले पर जो विरोध हुआ उसको देखते हुए दूसरे चरण के आरक्षण को लागू करने के संबंध में बाद की कोई सरकार अब तक हिम्मत नहीं जुटा सकी है। हालाँकि इस विषय पर कुछ वर्षों से संसद एवं सरकार में विभिन्न स्तरों पर विचार चल रहा है और संबंधित संसदीय समिति ने भी प्रबल सिफारिश की है कि अन्य पिछड़े वर्ग के अधिकारियों और कर्मचारियों को भी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की ही तरह पदोन्नति में आरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए। विभाग-संबंधित कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष ई. एम. सुदर्शन नाचीयप्पन की ओर से 29 जून, 2005 को राज्य सभा के सभापति को प्रस्तुत और उसी दिन लोक सभा अध्यक्ष को अग्रेषित अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (पदों और सेवाओं में आरक्षण) विधेयक, 2004 से संबंधित आठवें प्रतिवेदन में समिति ने सिफारिश की है कि “अन्य पिछड़े वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्रदान करने संबंधी संवैधानिक दायित्व को पूरा करने के लिए सरकार को पदोन्नति में भी अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों को आरक्षण देने पर विचार करना चाहिए और इस प्रस्ताव को अमल में लाने के लिए संविधान संशोधन किया जाना चाहिए।” इसके अलावा, सरकारी क्षेत्र में नौकरियों की विरल संभावना को देखते हुए निजी क्षेत्र में भी आरक्षण के प्रावधान को लागू किए जाने के संबंध में विभिन्न मंचों पर विचार उठाए जा रहे हैं। इसके लिए दलित वर्ग और पिछड़ा वर्ग को संगठित और समन्वित संघर्ष करना होगा। यह लंबी लड़ाई है और हो सकता है कि इसके सफल होने के लिए कई दशकों तक इंतजार करना पड़े।

Saturday, April 08, 2006

नसीहतें

कोई आदमी इतना बुरा नहीं होता कि

अपनी गलती का अहसास कभी कर न सके।

वहम का कोई जाल इतना सघन नहीं होता कि

उसको काटकर ग़लतफ़हमी दूर न की जा सके।

कोई जख्म इतना गहरा नहीं होता कि

वक्त के साथ भर न जाए।

कोई फासला इतना बड़ा नहीं होता कि

उसको तय कर करीब न आया जा सके।

कोई मुश्किल ऐसी नहीं होती कि

कोशिशों से आसान न बन जाए।

कोई मंजिल इतनी दूर नहीं होती कि

चलते-चलते एक दिन करीब न आ जाए।

कोई चीज ऐसी नहीं खुदा की कायनात में कि

जिसका कोई खूबसूरत इस्तेमाल हो न सके।

कोई विफलता इतनी बड़ी नहीं होती कि

नए सिरे से कोशिश शुरू न की जा सके।

कभी भी इतनी देर नहीं होती कि

सही राह पर आना मुमकिन न रहे।

ऐसी नौबत कभी नहीं आती कि

आगे कोई उम्मीद बाकी न रहे।