Saturday, March 18, 2006

बढ़ जाओ आगे तुम

बढ़ जाओ आगे तुम मैंने राह छोड़ दी है तुम्हारे लिए नहीं, हारा नहीं हूँ मैं पर मैं तुमसे लड़ा ही कब था मैंने लड़ना-भिड़ना छोड़ दिया है तुम इसे कायरता या पलायन मानते हो तो मानते रहो पर यह तुम भी जानते हो कि मैं वास्तव में क्या हूँ मेरे काम स्वयं ही प्रमाण हैं मेरी क्षमताओं के नहीं जरूरत है किसी सर्टिफ़िकेट की उसे। तुम तो कर्ण को भी अर्धरथी ही कहोगे सुभाष की जीत को तुम अपनी हार मान लोगे तुम जैसे लोग वॉन गॉग की कद्र जीते जी नहीं कर सकते कबीर को तुम कवि तक नहीं कह पाओगे तुम जगदीश बोस को प्राप्य श्रेय अपने नाम लूट लोगे ईसा को सूली पर चढ़ा दोगे तुम सुकरात को जहर दे दोगे तुम एकलव्य का अंगूठा माँग लोगे निहत्थे अभिमन्यु को सब घेरकर मार दोगे। तुम आज भी वही करोगे जो कल तक करते आए हो तुम कल भी वही करोगे जो आज कर रहे हो जाओ, मैं तुमसे क्या कहूँ तुमको कोई बददुआ देने का मन भी नहीं करता चले जाओ तुम, मैंने राह छोड़ दी है तुम्हारे लिए मुझे कुचलने का कष्ट मत करो तुम मैं खुद ही राह से हट गया हूँ हाँ, रणछोड़दास हूँ मैं। तुम बढ़ जाओ आगे, जहाँ तक जाना चाहते हो आख़िर कहाँ तक जाओगे तुमसे पहले भी बहुत लोग आगे गए हैं तुम्हारे बाद भी बहुत लोग जाएंगे तुम कहाँ तक पहुँच जाओगे कोई राह सीधी रेखा में नहीं है सारी गतियाँ वर्तुलाकार हैं लौट कर तुम फिर-फिर वही पहुँच जाओगे जहाँ से चले थे चाहे जीवन भर चलते रहो और चलते-चलते थक-चूर कर पस्त होकर मर जाओ।

1 comment:

मणिका said...

इतनी भीड़ भरी दुनिया में ऐसे रास्ता दूसरों के लिए छोड़ते रहेंगे तो पीछे रह जाएँगे।